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PM मोदी ने याद किए ‘गुड महाराजा’: द्वितीय विश्व युद्ध में 1,000 पोलिश बच्चों को भारत में दी थी शरण, 16 साल बाद भारत आए डोनाल्ड टस्क

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नई दिल्ली। भारत और पोलैंड के ऐतिहासिक रिश्तों की एक भावुक कहानी गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की मुलाकात के दौरान फिर चर्चा में आई। दिल्ली के हैदराबाद हाउस में हुई बैठक में पीएम मोदी ने ‘गुड महाराजा’ का उल्लेख किया। यह उपाधि जामनगर की तत्कालीन नवानगर रियासत के महाराजा दिग्विजयसिंहजी रणजीतसिंहजी जडेजा को दी गई थी, जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड के सैकड़ों बच्चों को भारत में शरण और सुरक्षा प्रदान की थी।

डोनाल्ड टस्क 21 से 23 अक्टूबर तक भारत के दौरे पर हैं। करीब 16 साल बाद पोलैंड के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा को दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

जब भारत ने पोलिश बच्चों के लिए खोले अपने दरवाजे

1939 में नाजी जर्मनी और सोवियत संघ के हमलों के बाद पोलैंड के लाखों नागरिकों को विस्थापन का सामना करना पड़ा। इनमें बड़ी संख्या में बच्चे भी शामिल थे, जिन्हें सुरक्षित ठिकाने की जरूरत थी।

ऐसे कठिन दौर में नवानगर के महाराजा दिग्विजयसिंहजी ने 1942 में जामनगर के पास बालाचड़ी में लगभग 1,000 पोलिश बच्चों को शरण दी। उनके रहने, खाने, शिक्षा और चिकित्सा की व्यवस्था की गई। बच्चों को अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने का अवसर भी दिया गया।

महाराजा के इस मानवीय योगदान के कारण पोलैंड में उन्हें ‘डोब्री महाराजा’ यानी ‘गुड महाराजा’ के नाम से सम्मानित किया जाने लगा। यह घटना भारत की मानवीय परंपरा और संकट के समय दूसरे देशों के नागरिकों की सहायता करने की मिसाल बन गई।

भारत में हजारों पोलिश शरणार्थियों को मिला आश्रय

पोलिश नागरिकों को भारत में केवल बालाचड़ी में ही नहीं, बल्कि अन्य स्थानों पर भी शरण मिली। कोल्हापुर रियासत के वलीवडे शिविर में भी हजारों पोलिश शरणार्थी रहे। यहां उनके लिए आवास के साथ शिक्षा और चिकित्सा जैसी सुविधाओं की व्यवस्था की गई थी।

1945 में द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद शरणार्थियों की अपने देश वापसी शुरू हुई। अगले कुछ वर्षों में अधिकांश पोलिश शरणार्थी लौट गए, लेकिन भारत में बिताए गए समय और यहां मिले सहयोग की यादें उनके परिवारों में बनी रहीं।

महाराजा दिग्विजयसिंहजी के योगदान को पोलैंड में विशेष सम्मान मिला। उनके नाम पर वारसॉ में ‘गुड महाराजा स्क्वायर’ भी बनाया गया। अगस्त 2024 में पोलैंड यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस चौक पर श्रद्धांजलि अर्पित की थी और भारत में शरण पाने वाले पोलिश परिवारों के वंशजों से मुलाकात की थी।

16 साल बाद भारत पहुंचे पोलैंड के प्रधानमंत्री

डोनाल्ड टस्क 2010 के बाद पहली बार भारत आए हैं। उनके साथ लगभग 100 पोलिश कंपनियों का कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भी आया है। इस यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को मजबूत करना है।

पोलैंड ने 2030 तक भारत के साथ सालाना व्यापार दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी और निवेश के नए अवसर तलाश रहा है।

नई दिल्ली में कार्यक्रमों के बाद टस्क 23 अक्टूबर को बेंगलुरु जाएंगे। वहां वे सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और अन्य तकनीकी क्षेत्रों से जुड़े उद्योग प्रतिनिधियों तथा कारोबारियों से मुलाकात करेंगे।

चार प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर

1. रक्षा उत्पादन में साझेदारी

भारत और पोलैंड रक्षा उपकरणों के डिजाइन, विकास और उत्पादन में सहयोग की संभावनाएं तलाश रहे हैं। इसके लिए तकनीकी सहयोग के साथ संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा और आपसी भरोसे से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण होंगे।

2. व्यापार और निवेश

पोलैंड की कंपनियां भारतीय बाजार में कारोबार बढ़ाने के अवसर तलाश रही हैं। दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को विस्तार देने में उद्योगों की साझेदारी और भारत-यूरोपीय संघ के व्यापारिक संबंधों में प्रगति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

3. अंतरिक्ष और आधुनिक तकनीक

सूचना प्रौद्योगिकी, डिजिटल तकनीक, अंतरिक्ष और बैटरी रिसाइक्लिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं हैं। पोलैंड की खाद्य प्रसंस्करण, मशीनरी और खनन क्षेत्र की विशेषज्ञता भी भारत के लिए उपयोगी हो सकती है।

4. यूक्रेन में शांति और वैश्विक मुद्दे

यूक्रेन युद्ध और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषय भी दोनों देशों की बातचीत के व्यापक संदर्भ में हैं। भारत और पोलैंड के बीच संवाद से अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विचारों के आदान-प्रदान और सहयोग को आगे बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।

ऐतिहासिक रिश्तों से भविष्य की साझेदारी तक

मोदी और टस्क की मुलाकात केवल कूटनीतिक बातचीत तक सीमित नहीं है। ‘गुड महाराजा’ की कहानी दोनों देशों के रिश्तों में मानवीय संवेदना और ऐतिहासिक विश्वास की अहमियत को भी रेखांकित करती है।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय रियासतों ने जिन पोलिश बच्चों और परिवारों को आश्रय दिया था, वह इतिहास आज भी भारत-पोलैंड संबंधों का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। अब दोनों देश इस ऐतिहासिक मित्रता को व्यापार, रक्षा, अंतरिक्ष और तकनीक जैसे आधुनिक क्षेत्रों में मजबूत साझेदारी में बदलने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।

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