किसी के लिए यह वर्षों से चला आ रहा पारिवारिक विवाद था। किसी के लिए पुरानी रंजिश। किसी के लिए चोरी हुई मोटरसाइकिल का मामला। और किसी के लिए बैंक, बिजली या टेलीकॉम का बकाया। लेकिन 12 सितम्बर 2026 को दुर्ग में इन कहानियों का अंत एक ही जगह हुआ संवाद, समझौते और आपसी सहमति के साथ। यही है लोक अदालत की असली ताकत। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली के निर्देशों, छत्तीसगढ़ राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, बिलासपुर के मार्गदर्शन तथा प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश-सह-अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, दुर्ग के निर्देशन में वर्ष 2026 की तृतीय नेशनल लोक अदालत का आयोजन दुर्ग जिले के विभिन्न न्यायालयों एवं न्यायिक संस्थानों में किया गया। इस लोक अदालत में 4.10 लाख से अधिक न्यायालयीन एवं प्री-लिटिगेशन प्रकरणों का निराकरण हुआ तथा लगभग ₹685.90 करोड़ की समझौता राशि पर सहमति बनी। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं – 4 लाख से अधिक समाधान की कहानियां हैं इस नेशनल लोक अदालत में कुल 37 खण्डपीठों का गठन किया गया।
परिवार न्यायालय दुर्ग, जिला न्यायालय दुर्ग, व्यवहार न्यायालय भिलाई-3, पाटन एवं धमधा, किशोर न्याय बोर्ड, श्रम न्यायालय, स्थायी लोक अदालत (जनोपयोगी सेवाएं), राजस्व न्यायालय तथा उपभोक्ता फोरम सहित विभिन्न संस्थानों में मामलों की सुनवाई हुई। 13,851 न्यायालयीन प्रकरण तथा 3,96,869 प्री-लिटिगेशन इस प्रकार कुल 4,10,720 प्रकरण निराकृत किए गए। इनमें बैंकिंग एवं वित्तीय संस्थाओं, विद्युत तथा दूरसंचार से जुड़े बड़ी संख्या में प्री-लिटिगेशन विवाद भी शामिल रहे। कुछ मामले ऐसे रहे, जिन्हें आंकड़ों में नहीं मापा जा सकता एक फैसला… जिसने एक परिवार को फिर से जोड़ दिया परिवार न्यायालय, दुर्ग में पति-पत्नी के बीच लंबे समय से मतभेद चल रहे थे। मामला नेशनल लोक अदालत में पहुंचा। न्यायालय ने दोनों पक्षों को केवल उनके कानूनी अधिकारों के संदर्भ में नहीं, बल्कि उनके भविष्य, सम्मान, विश्वास और पारिवारिक जीवन के संदर्भ में भी सोचने के लिए प्रेरित किया। दोनों ने पुराने मतभेद पीछे छोड़ने, एक-दूसरे के प्रति सम्मान और विश्वास के साथ आगे बढ़ने का निर्णय लिया। और फिर अदालत में ही दोनों ने एक-दूसरे को माला पहनाई। एक मुकदमा खत्म हुआ। लेकिन उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण – एक परिवार फिर से शुरू हुआ। दोनों पक्ष खुशी-खुशी अपने घर लौट गए। पुरानी पारिवारिक रंजिश को मिली नई शुरुआत एक अन्य प्रकरण में एक ही परिवार के सदस्यों के बीच लंबे समय से चली आ रही कटुता ने आपराधिक मुकदमे का रूप ले लिया था। वर्षों से लंबित इस विवाद ने परिवार के रिश्तों में तनाव और दूरी पैदा कर दी थी। नेशनल लोक अदालत में न्यायालय ने पक्षकारों की भावनाओं और पारिवारिक संबंधों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए संवाद का वातावरण तैयार किया। नतीजा – पुरानी रंजिश खत्म हुई और आपसी सहमति से विवाद का शांतिपूर्ण समाधान हो गया। इस प्रकरण में पांच संबंधित पक्षकार थे। सभी की व्यक्तिगत उपस्थिति संभव न होने पर तकनीक को समाधान की राह में बाधा नहीं बनने दिया गया। कुछ पक्षकारों ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भागीदारी की और समझौते की प्रक्रिया पूरी की।
Technology ने दूरी घटाई, और Mediation ने रिश्तों की दूरी। एक मोटरसाइकिल, एक गलती और एक माफी एक अन्य मामले में रात के समय घर लौट रहे एक व्यक्ति का ईयरफोन रास्ते में गिर गया। उसे उठाने के लिए जब वह रुका और वापस आया तो उसकी मोटरसाइकिल वहां नहीं थी। मोटरसाइकिल चोरी की रिपोर्ट दर्ज हुई और मामला न्यायालय तक पहुंचा। बाद में मोटरसाइकिल बरामद होकर प्रार्थी को सुपुर्द कर दी गई। नेशनल लोक अदालत में प्रकरण रखा गया। प्रार्थी ने आपसी राजीनामे की इच्छा व्यक्त की। न्यायालय की समझाइश के बाद आरोपियों ने भविष्य में ऐसी गलती न दोहराने की बात कहते हुए प्रार्थी से माफी मांगी। प्रार्थी ने भी सहमति व्यक्त की। और एक बार फिर – मुकदमे की जगह संवाद ने रास्ता बनाया। मामला आपसी राजीनामे के आधार पर सौहार्दपूर्ण वातावरण में समाप्त हो गया। लोक अदालत के साथ ‘Justice + Care’ का मॉडल इस नेशनल लोक अदालत की खासियत केवल मामलों का निराकरण नहीं रही। न्यायालय परिसर में आने वाले पक्षकारों और आम नागरिकों के लिए जिला चिकित्सालय, दुर्ग के सहयोग से एक दिवसीय निःशुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर भी आयोजित किया गया। चिकित्सा अधिकारी डॉ. निवेदिता गार्डिया एवं स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों ने स्वास्थ्य परीक्षण एवं आवश्यक सेवाएं प्रदान की। न्यायिक अधिकारियों, अधिवक्ताओं, पक्षकारों तथा बड़ी संख्या में आम नागरिकों ने स्वास्थ्य जांच का लाभ लिया।
अर्थात – “Justice for the case, Care for the person.” जेल से निकली हुनर की कहानी भी पहुंची लोक अदालत तक केंद्रीय जेल, दुर्ग में निरुद्ध बंदियों द्वारा निर्मित जेल उत्पादों की प्रदर्शनी एवं बिक्री भी नेशनल लोक अदालत के अवसर पर लगाई गई। उपस्थित लोगों ने इन उत्पादों की सराहना की। यह पहल इस संदेश को भी सामने लाती है कि न्याय व्यवस्था केवल दंड तक सीमित नहीं है – सुधार, पुनर्वास और समाज की मुख्यधारा में वापसी भी न्याय का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लोक अदालत क्यों अलग है? क्योंकि यहां सवाल केवल यह नहीं होता कि – “कौन सही है?” सवाल यह भी होता है कि – “क्या ऐसा रास्ता निकाला जा सकता है जिसमें दोनों पक्ष आगे बढ़ सकें?” लोक अदालत इसी सोच को आगे बढ़ाती है। यह वर्षों के विवाद को घंटों में, कभी-कभी घंटों के विवाद को मिनटों में, और एक मुकदमे को एक नए रिश्ते में बदल सकती है। यह न्याय का ऐसा मॉडल है जहां कानून के साथ मानवीय संवेदना भी चलती है।