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केन्द्रीय जेल दुर्ग के निरीक्षण में ‘न्यायश्रुति’ और ‘ई-साक्ष्य’ पर विशेष जोर

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दुर्ग, 02 अक्टूबर 2026/ प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री के. विनोद कुजूर ने बंदियों के अधिकारों, डिजिटल न्यायिक प्रक्रिया और सुधारात्मक व्यवस्थाओं की व्यापक समीक्षा की। न्याय केवल अदालत की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। जेल की दीवारों के भीतर निरुद्ध प्रत्येक व्यक्ति तक भी न्याय की प्रक्रिया समयबद्ध, पारदर्शी और प्रभावी रूप से पहुंचे-इसी दृष्टिकोण के साथ प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, दुर्ग श्री के. विनोद कुजूर ने मुख्यालय स्थित केन्द्रीय जेल, दुर्ग का निरीक्षण किया।

निरीक्षण के दौरान बंदियों के अधिकारों, विधिक सहायता, स्वास्थ्य, स्वच्छता, भोजन, प्रकरणों की स्थिति, पुनर्वास एवं आश्रित परिवारों की समस्याओं के साथ-साथ न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक के प्रभावी उपयोग, विशेषकर ‘न्यायश्रुति’ एवं ‘ई-साक्ष्य’ से संबंधित पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया गया।

जेल से कोर्ट तक – न्याय की प्रक्रिया में तकनीक की भूमिका

प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने इस बात पर विशेष बल दिया कि वर्तमान समय में न्यायिक प्रक्रिया में डिजिटल तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हो रही है। ऐसे में जेल प्रशासन, विधिक सहायता व्यवस्था और न्यायालयीन प्रक्रिया के बीच बेहतर तकनीकी समन्वय आवश्यक है।
‘न्यायश्रुति’ के माध्यम से साक्ष्य एवं न्यायिक कार्यवाही से जुड़ी प्रक्रियाओं तथा ‘ई-साक्ष्य’ के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक/डिजिटल साक्ष्य के न्यायालयीन उपयोग की प्रक्रिया के संबंध में आवश्यक जानकारी एवं जागरूकता पर विशेष जोर दिया गया। इसका मूल उद्देश्य यही है कि – “Technology न्याय से अलग कोई व्यवस्था नहीं, बल्कि न्याय को अधिक सुलभ, व्यवस्थित और प्रभावी बनाने का माध्यम बने।”
सजायाफ्ता बंदियों के अपील संबंधी प्रकरणों को अद्यतन रखने तथा उन्हें उनके प्रकरण की वर्तमान स्थिति से अवगत कराने के संबंध में जेल अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए गए। नव-आगंतुक बंदियों को उनके प्रकरण से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के तरीके के बारे में बताया गया। साथ ही ऐसे बंदी जो निजी अधिवक्ता नियुक्त करने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से निःशुल्क विधिक सहायता एवं अधिवक्ता उपलब्ध कराए जाने की जानकारी दी गई।

SPRUHA Scheme: जेल की दीवारों के बाहर परिवार की कहानी भी महत्वपूर्ण

निरीक्षण का एक महत्वपूर्ण पक्ष NALSA की SPRUHA (Supporting Potential and Resilience of the Unseen, Held-back and Affected) Scheme, 2025 रहा। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने संवाद करते हुए यह जानने का प्रयास किया कि निरुद्ध बंदियों के कारावास के दौरान उनके आश्रित-पत्नी, बच्चे एवं वृद्ध माता-पिता-किन सामाजिक, आर्थिक और व्यवहारिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।      
विशेष रूप से आजीविका, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य उपचार, भरण-पोषण और दैनिक आवश्यकताओं से जुड़ी समस्याओं के संबंध में जानकारी ली गई। पात्र बंदियों एवं उनके आश्रित परिवारजनों की पहचान कर उन्हें जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराने तथा पात्रता के अनुसार केंद्र एवं राज्य शासन की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने के लिए आवश्यक कार्यवाही सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।

PLV होंगे परिवारों तक पहुंचने की कड़ी

प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा यह भी निर्देशित किया गया कि पैरा लीगल वालेंटियर्स (PLVs) के माध्यम से आश्रित परिवारों का फील्ड स्तर पर सत्यापन किया जाए और उनकी वास्तविक समस्याओं की पहचान कर संबंधित विभागों के साथ समन्वय स्थापित किया जाए अर्थात् सहायता केवल जेल परिसर तक सीमित न रहे, बल्कि जरूरतमंद परिवार तक जमीनी स्तर पर पहुंचे।

स्वास्थ्य, गरिमा और पुनर्वास भी न्याय का हिस्सा

निरीक्षण के दौरान जेल प्रशासन को ऐसे बंदियों के संबंध में भी जानकारी जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए, जिन्हें परिहार का लाभ प्राप्त हो सकता है और जिनके आवेदन लंबित हैं। निरीक्षण के उपरांत अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा शंकर महतो प्रकरण में प्रतिपादित सिद्धांतों एवं दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जाए।
विशेष रूप से – मानवीय गरिमा | स्वच्छता | स्वास्थ्य | पोषण | मानसिक स्वास्थ्य | सुरक्षा | विधिक सहायता | पुनर्वास से संबंधित व्यवस्थाओं को प्राथमिकता देते हुए आवश्यक सुधारात्मक उपाय निरंतर किए जाने पर जोर दिया गया।

एक निरीक्षण, कई आयाम

केन्द्रीय जेल दुर्ग का यह निरीक्षण केवल व्यवस्थाओं के भौतिक अवलोकन तक सीमित नहीं रहा। इसमें बंदी के अधिकार से लेकर उसके परिवार की चिंता, विधिक सहायता से लेकर डिजिटल न्यायिक प्रक्रिया और कारावास से लेकर पुनर्वास तक न्याय व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं को एक साथ देखा गया।
न्यायश्रुति और ई-साक्ष्य जैसे तकनीकी माध्यमों के प्रभावी उपयोग पर जोर इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा रहा-जहां तकनीक का अंतिम उद्देश्य प्रक्रिया को नहीं, बल्कि न्याय को अधिक प्रभावी बनाना है। निरीक्षण के दौरान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट भूपेश कुमार बसंत, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण दुर्ग के सचिव उमेश कुमार भागवतकर, जेल अधीक्षक एवं अन्य कर्मचारीगण उपस्थित रहे।

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