रायपुर, 07 अक्टूबर 2026/ बच्चों को अपने आसपास के पर्यावरण को देखने, समझने, सवाल पूछने और अपने अनुभवों को रचनात्मक रूप से अभिव्यक्त करने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से आयोजित दो दिवसीय ‘कहानीकार’ कार्यशाला का मंगलवार को समापन हुआ। कार्यशाला के दूसरे दिन शिक्षकों ने कहानी लेखन, रचनात्मक गतिविधियों और संवादात्मक सत्रों में सक्रिय भागीदारी करते हुए पहले दिन की सीख को आगे बढ़ाया।
आईआईएसईआर पुणे के केयर प्रोजेक्ट, समग्र शिक्षा छत्तीसगढ़, यूनिसेफ तथा छत्तीसगढ़ रीजनल साइंस सेंटर, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के संयुक्त सहयोग से 6 एवं 7 अक्टूबर को जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एक्शन (एक्सआईएसए), विधानसभा रोड, रायपुर में आयोजित कार्यशाला में प्रदेश के विभिन्न जिलों से शासकीय विद्यालयों के शिक्षक शामिल हुए।
शिक्षकों ने तैयार की कहानियां, साझा किए अनुभव
कार्यशाला के दूसरे दिन प्रतिभागी शिक्षकों ने अपनी कहानियों को विकसित किया और उन्हें एक-दूसरे के साथ साझा किया। स्टोरीटेलिंग गतिविधियों और संवादात्मक सत्रों के माध्यम से बच्चों के स्थानीय परिवेश, दैनिक अनुभवों और प्रकृति को कहानी से जोड़कर सीखने की प्रक्रिया को अधिक रोचक और प्रभावी बनाने के तरीकों पर चर्चा की गई।
इस दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि कहानी केवल जानकारी देने का माध्यम न होकर बच्चों में अवलोकन, जिज्ञासा, स्वतंत्र सोच, कल्पनाशीलता और अपनी बात अभिव्यक्त करने की क्षमता विकसित करने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
‘कहानीकार पुस्तक मेला’ बना विशेष आकर्षण
दूसरे दिन आयोजित ‘कहानीकार पुस्तक मेला’ कार्यशाला का प्रमुख आकर्षण रहा। पुस्तक मेले में शिक्षकों को विभिन्न पुस्तकों, कहानियों और रचनात्मक अभिव्यक्तियों से परिचित होने का अवसर मिला। पुस्तकों को कल्पना, ज्ञान, संवाद और सीखने के प्रभावी माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया गया।
शिक्षकों को बताया गया कि किताबों और कहानियों को कक्षा की गतिविधियों से जोड़कर बच्चों में पढ़ने की रुचि बढ़ाने के साथ उनकी रचनात्मकता और स्वतंत्र सोच को भी प्रोत्साहित किया जा सकता है।
कहानी और कला से प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनेंगे बच्चे
कार्यशाला में कहानी, कला और स्थानीय अनुभवों के माध्यम से बच्चों को प्रकृति एवं पर्यावरण से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया। बच्चों को अपने आसपास की प्रकृति का स्वयं अवलोकन करने, प्रश्न पूछने और अपने अनुभवों को कहानी के रूप में व्यक्त करने के अवसर देकर सीखने की प्रक्रिया को अधिक सहज और अर्थपूर्ण बनाया जा सकता है।
साथ ही पर्यावरणीय संवेदनशीलता को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखकर बच्चों के दैनिक जीवन और व्यवहार का हिस्सा बनाने की आवश्यकता बताई गई।
‘जुगनू’ देगा बच्चों और शिक्षकों की रचनात्मकता को मंच
कार्यशाला के दौरान बच्चों के लिए भारत के पहले द्विभाषी हिंदी-अंग्रेजी क्लाइमेट टैब्लॉइड ‘जुगनू’ को भी प्रस्तुत किया गया। आईआईएसईआर पुणे के केयर प्रोजेक्ट की एक्शन रिसर्च से विकसित ‘जुगनू’ के माध्यम से देशभर के बच्चों और शिक्षकों की कहानियों, स्थानीय अनुभवों तथा प्रकृति, पर्यावरण एवं जलवायु से जुड़ी रचनात्मक सामग्री को मंच प्रदान किया जाएगा।
केयर प्रोजेक्ट की प्रोजेक्ट लीड एवं ‘जुगनू’ की पब्लिशर डॉ. शालिनी शर्मा ने बताया कि इसका उद्देश्य बच्चों में पर्यावरणीय चुनौतियों को लेकर केवल चिंता पैदा करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने आसपास के परिवेश को समझने, सवाल पूछने, अपनी आवाज अभिव्यक्त करने और सकारात्मक बदलाव के लिए पहल करने को प्रेरित करना है।
अनुभव साझा करने और प्रमाण-पत्र वितरण के साथ समापन
समापन सत्र में प्रतिभागी शिक्षकों ने दो दिनों की अपनी सीख और अनुभव साझा किए। इसके बाद छत्तीसगढ़ रीजनल साइंस सेंटर के प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. शिरीष कुमार सिंह तथा एनआईटी रायपुर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर डॉ. राज कुमार साहू की उपस्थिति में प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए।
दो दिवसीय ‘कहानीकार’ कार्यशाला ने शिक्षकों को ऐसे रचनात्मक और अनुभवात्मक तरीकों से परिचित कराया, जिनका उपयोग वे कक्षाओं में बच्चों को देखने, सोचने, सवाल करने, अपनी बात कहने और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बनने के लिए प्रेरित करने में कर सकेंगे। ‘आर्ट ऐस स्टोरी, स्टोरी ऐस नॉलेज, नॉलेज ऐस एक्शन’ की अवधारणा पर आधारित यह पहल शिक्षा को स्थानीय परिवेश, प्रकृति और बच्चों के अनुभवों से जोड़ने की दिशा में एक सार्थक प्रयास रही।