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देश में जल संकट की आहट: 178 प्रमुख जलाशयों में सिर्फ 68.58% पानी, दक्षिण भारत के कई बेसिनों की स्थिति चिंताजनक

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देश से मानसून की विदाई के बाद भी प्रमुख जलाशयों में पर्याप्त पानी जमा नहीं हो पाना चिंता बढ़ा रहा है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल उपयोगी भंडारण क्षमता का 68.58 प्रतिशत पानी ही मौजूद है। यानी इन जलाशयों की करीब 31.42 प्रतिशत क्षमता खाली है। इसका असर आने वाले महीनों में पेयजल आपूर्ति, कृषि सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन पर पड़ सकता है।

मानसून के बाद बांधों और जलाशयों में जमा पानी अगले कई महीनों तक देश की जल जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में जल भंडारण में कमी चिंता का विषय है। हालांकि, संकट की वास्तविक गंभीरता अलग-अलग राज्यों में बारिश, स्थानीय जल स्रोतों और पानी की मांग पर भी निर्भर करेगी।

पिछले साल की तुलना में जल भंडारण में बड़ी गिरावट

केंद्रीय जल आयोग की निगरानी में शामिल 178 प्रमुख जलाशयों की कुल उपयोगी भंडारण क्षमता 184.762 अरब घन मीटर (BCM) बताई गई है। यह देश की कुल 257.812 अरब घन मीटर भंडारण क्षमता का लगभग 71.67 प्रतिशत है।

दिए गए आंकड़ों के अनुसार, इन जलाशयों में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 41.193 अरब घन मीटर कम पानी दर्ज किया गया है। यह करीब 24.53 प्रतिशत की गिरावट है। वहीं, पिछले दस वर्षों के औसत भंडारण की तुलना में भी जल उपलब्धता 16.44 प्रतिशत कम बताई गई है।

यदि जल भंडारण की स्थिति में सुधार नहीं होता, तो आने वाले गर्मी के मौसम में कई क्षेत्रों में पानी की मांग पूरी करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

कावेरी और पेन्नार बेसिन में सबसे ज्यादा चिंता

नदी बेसिनों के आंकड़ों में दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक दिखाई देती है।

  • पेन्नार बेसिन: सामान्य भंडारण से 72.32 प्रतिशत कम पानी।
  • कावेरी बेसिन: सामान्य स्तर से 60.50 प्रतिशत कम जल भंडार।
  • कृष्णा बेसिन: सामान्य से 32.59 प्रतिशत कम पानी।
  • साबरमती बेसिन: सामान्य से 38.03 प्रतिशत कम जल उपलब्धता।

कावेरी नदी बेसिन कर्नाटक और तमिलनाडु के कई क्षेत्रों के लिए पेयजल और सिंचाई का अहम स्रोत है। वहीं, पेन्नार और कृष्णा बेसिन में कम जल भंडारण से खेती और स्थानीय जल आपूर्ति पर दबाव बढ़ने की आशंका है।

कर्नाटक, केरल और महाराष्ट्र के कुछ जलाशयों में कम पानी

रिपोर्ट में कुछ जलाशयों के भंडारण को लेकर भी चिंता जताई गई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, कर्नाटक के अलियार जलाशय में सामान्य भंडारण की तुलना में जलस्तर बेहद नीचे बताया गया है। केरल के इडुक्की बांध और महाराष्ट्र के उजनी जलाशय में सामान्य भंडारण का केवल 10.62 प्रतिशत पानी शेष होने का उल्लेख है।

इसके अलावा, आयोग के आंकड़ों के अनुसार 42 जलाशयों में पानी का स्तर उनके सामान्य भंडारण के 50 से 80 प्रतिशत के बीच दर्ज किया गया है।

जलाशयों की स्थिति का स्थानीय पेयजल आपूर्ति, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि वहां उपलब्ध पानी कितना है और आने वाले समय में उसकी कितनी मांग रहेगी।

नर्मदा और स्वर्णरेखा बेसिन में राहत

देश के सभी क्षेत्रों में जल भंडारण की स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ नदी बेसिनों में सामान्य से अधिक पानी दर्ज किया गया है।

  • स्वर्णरेखा बेसिन: सामान्य से 30.74 प्रतिशत अधिक पानी।
  • नर्मदा बेसिन: सामान्य से 7.81 प्रतिशत अधिक पानी।
  • महानदी बेसिन: सामान्य से 2.95 प्रतिशत अधिक भंडारण।

दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, गंगा, ताप्ती, गोदावरी, ब्रह्मपुत्र और ब्राह्मणी-बैतरणी बेसिनों में जल उपलब्धता सामान्य स्तर के आसपास है। इससे स्पष्ट होता है कि देश में जल भंडारण की स्थिति क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग है।

रबी की खेती और बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है असर

जलाशयों में पानी कम रहने से आगामी रबी सीजन में सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी पर दबाव बढ़ सकता है। यदि संबंधित क्षेत्रों में बारिश और अन्य जल स्रोतों से पर्याप्त भरपाई नहीं होती, तो कुछ जगहों पर किसानों को सिंचाई के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

जलविद्युत परियोजनाओं पर भी इसका असर पड़ने की आशंका है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 20 प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े जलाशयों में से 12 का भंडारण सामान्य स्तर से कम या उसके बराबर है। हालांकि, बिजली उत्पादन पर वास्तविक असर परियोजना की स्थिति, पानी की उपलब्धता और संचालन संबंधी जरूरतों पर निर्भर करेगा।

जल संकट से निपटने के लिए अभी से तैयारी जरूरी

जल भंडारण में कमी को देखते हुए राज्यों के लिए पानी का योजनाबद्ध इस्तेमाल, भूजल संरक्षण और स्थानीय जल स्रोतों का प्रबंधन महत्वपूर्ण होगा। पेयजल की प्राथमिक जरूरतों को सुरक्षित रखते हुए सिंचाई और अन्य क्षेत्रों के लिए उपलब्ध पानी का संतुलित वितरण भी जरूरी है।

विशेषज्ञों के अनुसार, जल संकट से निपटने के लिए केवल मानसूनी बारिश पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, जलाशयों की नियमित निगरानी और पानी की बर्बादी रोकने जैसे उपाय लंबे समय में मददगार हो सकते हैं।

नोट: यहां दिए गए आंकड़े उपलब्ध कराई गई रिपोर्ट पर आधारित हैं। वर्तमान जल भंडारण की पुष्टि और क्षेत्रवार स्थिति के लिए केंद्रीय जल आयोग की नवीनतम आधिकारिक रिपोर्ट देखना उचित होगा।

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