युवा और बच्चे ईयरफोन, हेडफोन, ईयर बर्ड्स का लगातार प्रयोग कर रहे हैं, तो सचेत हो जाएं। ऐसे लोगों को बुढ़ापे में होने वाली बीमारी कम उम्र में ही होने लगी है। वे उच्च आवृत्ति श्रवण हानि के शिकार हो रहे हैं, यानी सुनने की क्षमता घट रही है। ऐसे मरीजों को कान में सीटी बजने, सनसनाहट, चिड़चिड़ापन जैसी परेशानी हो रही है। वे जब 50 के पार होंगे तो उनमें अकेलापन और डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं। कई ऐसे मरीज अस्पताल पहुंच रहे हैं, जिनके सुनने की क्षमता घटी है।
अंबेडकर अस्पताल में हर माह 10-12 मरीज पहुंच रहे हैं, जिन्हें ऐसी समस्या हो रही है। जितने मरीज अस्पताल पहुंचे, उनमें एक चीज सामान्य पाई गई। अधिकतर मरीज ईयरफोन या हेडफोन जैसे इलेक्ट्रानिक्स गैजेट लगातार उपयोग कर रहे थे।
दरअसल, मनोरंजन के तौर पर, काम के उद्देश्य से, कुछ चीजें सीखने आदि के लिए आजकल लोग लगातार ईयरफोन या हेडफोन का उपयोग कर रहे हैं, जो कान को गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार 2050 तक दुनिया के करीब 100 करोड़ लोग बहरे हो जाएंगे और इनकी उम्र 12 से 35 साल के बीच होगी।
किन कारण और क्या हो रही परेशानी : अंबेडकर अस्पताल की ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. मान्या ठाकुर ने बताया कि फुल वॉल्यूम में लगातार इयरफोन, हेडफोन या ईयरबर्ड्स लगाकर वेब सीरीज देखने, अॉनलाइन क्लास लेने, फुल साउंड में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करने, तेज आवाज में गाना सुनने, वीडियोगेम खेलने वालों को कम उम्र में ही परेशानियां हो रही हैं।
प्योर टोन ऑडियोमेट्री टेस्ट में उनमें 3 किलोहर्ट्ज से 6 किलोहर्ट्ज वाले क्षेत्र में सुनने की क्षमता कम पाई जा रही है। आईएमए रायपुर के अध्यक्ष व ईएनटी एक्सपर्ट डॉक्टर राकेश गुप्ता ने बताया कि ये गैजेट हमारे लिए अभिशाप हैं। ये साइलेंट किलर की तरह हैं। इसके खिलाफ अवेयरनेस कैंपेन चलाने की जरूरत है।
- मरीजों की लगातार काउंसलिंग हो ताकि आदतों को बदला जा सके।
- उचित आकार के इयरप्लग/हेडफोन का उपयोग करें, जिसमें नॉइस कैंसिलेशन मोड हो।
- लगातार सुनने के बजाए हर घंटे 20 मिनट का ब्रेक भी लें।
- अपने ईयरफोन का लेनदेन न करें। क्योंकि कान की बैक्टीरिया स्थानांतरित हो सकती है।
- कान की कलियों के आसपास बैक्टीरिया, पसीने और कटी हुई मृत त्वचा जम जाती है, जिससे इन्फेक्शन हो सकता है।