राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहचान ही अनुशासन, संगठन और राष्ट्रभक्ति से होती है। बुधवार को कोमाखान नगर इस भावना का गवाह बना, जब संघ ने अपने शताब्दी वर्ष के अवसर पर विजयादशमी उत्सव का आयोजन किया। नगर की सड़कों से गुज़रता संघ का पथ संचलन केवल एक शोभायात्रा नहीं, बल्कि समाज के सामने राष्ट्रीय एकता और समर्पण का संदेश लेकर आया।

विजयादशमी — संघ का स्थापना दिवस और ऐतिहासिक अवसर
संघ के छह प्रमुख आयोजनों में विजयादशमी को सबसे विशेष माना जाता है। यह केवल धर्म और सत्य की जीत का प्रतीक ही नहीं, बल्कि संघ की स्थापना का दिन भी है। शताब्दी वर्ष के इस आयोजन में कोमाखान क्षेत्र के हर गांव से स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में पहुंचे। उनकी उपस्थिति ने यह साबित किया कि संगठन और अनुशासन ही सशक्त भारत की सबसे मजबूत नींव हैं।
घोष की गूंज और अनुशासित कदमताल ने मोहा मन
दोपहर 2 बजे मंडी प्रांगण से प्रारंभ हुआ पथ संचलन जैसे ही नगर की गलियों और मुख्य चौक-चौराहों से गुज़रा, वातावरण में राष्ट्रभक्ति का जोश उमड़ पड़ा। घोष की धुन पर एकसमान कदमताल करते स्वयंसेवक नागरिकों के आकर्षण का केंद्र बने। नगरवासियों ने जगह-जगह पुष्पवर्षा और जयघोष के साथ स्वागत कर राष्ट्रप्रेम की अभिव्यक्ति की।
बौद्धिक सत्र में गूंजे राष्ट्रनिर्माण के विचार
संचलन के बाद आयोजित बौद्धिक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि चिकित्सक डॉ. अरुण शुक्ला ने कहा कि संघ की सौ वर्षीय यात्रा कठिनाइयों और विरोधों से भरी रही है, लेकिन संगठन ने कभी राष्ट्रसेवा के मार्ग से विचलन नहीं किया। मुख्य वक्ता शैलेश अग्रवाल (जिला बाल कार्य प्रमुख) ने अपने संबोधन में कहा कि जैसे बूंद-बूंद मिलकर समुद्र बनता है, वैसे ही प्रत्येक स्वयंसेवक के योगदान से संघ आज विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बना है।
उन्होंने विजयादशमी को अच्छाई की जीत और अधर्म पर धर्म की विजय का पर्व बताते हुए कहा कि संघ इसी परंपरा का पालन करते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, समाजसेवा और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में कार्य कर रहा है।
नगरवासियों का उमड़ा उत्साह
कोमाखान की गलियों में बुधवार का दृश्य अनोखा था। बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग—हर कोई इस ऐतिहासिक संचलन का हिस्सा बनने उमड़ पड़ा। व्यापारी, सामाजिक कार्यकर्ता और अधिकारी भी इस आयोजन में शामिल हुए। यह दृश्य केवल धार्मिक आयोजन का नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण का प्रतीक बन गया।
शताब्दी वर्ष का संदेश — नवसंकल्प और राष्ट्र सेवा
संघ का यह विजयादशमी पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि शताब्दी वर्ष का आत्ममंथन भी था। बीते 100 वर्षों में संघ ने शिक्षा, आपदा प्रबंधन, सेवा बस्तियों और पर्यावरण अभियान तक समाज के हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। यह आयोजन स्वयंसेवकों को और अधिक समर्पण व निष्ठा के साथ राष्ट्र निर्माण में जुड़ने की प्रेरणा देता है।
आज जब समाज में विभाजन और स्वार्थ की प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं, तब संघ का अनुशासन और संगठन समाज के लिए आदर्श है। कोमाखान में हुआ यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों को याद दिलाएगा कि राष्ट्र सेवा कोई अवसर नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली साधना है।
पुष्पवर्षा से सजे मार्ग, घोष की लय, अनुशासित पथ संचलन और प्रेरणादायी उद्बोधन ने यह स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की जीवंत धारा है। शताब्दी विजयादशमी का यह पर्व अनुशासन, संगठन और राष्ट्रभक्ति का उज्ज्वल उदाहरण बनकर इतिहास में दर्ज हो गया।