हिंदी सिनेमा के “सदी के महानायक” अमिताभ बच्चन आज 83 साल के हो गए। पाँच दशकों से भी अधिक लंबे करियर में उन्होंने सिर्फ अभिनय ही नहीं किया, बल्कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की परिभाषा ही बदल दी। 11 अक्टूबर 1942 को जन्मे इलाहाबाद के इस सपनों के मुसाफिर ने मुंबई आकर जब पहला कदम रखा, तो किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यही शख्स आगे चलकर एंग्री यंग मैन, महानायक, और लीजेंड कहलाएगा।
एंग्री यंग मैन का जन्म
1970 के दशक में ‘आनंद’ और ‘जंजीर’ से जो सफर शुरू हुआ, उसने अमिताभ को लाखों दिलों का चहेता बना दिया। ‘जंजीर’ के विजय खन्ना ने युवाओं की आवाज़ दी, तो ‘दीवार’ और ‘शोले’ ने उन्हें नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।
-
‘दीवार’ (1975) का डायलॉग “आज मेरे पास मां है” आज भी भारतीय सिनेमा की आत्मा बनकर गूंजता है।
-
वहीं ‘शोले’ का जय, दोस्ती और भावनाओं का प्रतीक बन गया।
बहुमुखी अभिनय
अमिताभ बच्चन ने कभी खुद को एक ही खांचे में कैद नहीं किया।
-
कॉमेडी: ‘चुपके-चुपके’, ‘अमर अकबर एंथनी’
-
रोमांस: ‘सिलसिला’, ‘कभी कभी’
-
सीरियस रोल: ‘ब्लैक’, ‘पा’, ‘पिंक’, ‘पीकु’
हर बार उन्होंने अपने अभिनय से दर्शकों को चौंकाया और विश्वास दिलाया कि हर किरदार उनके लिए बना है।
2000 के बाद की नई पहचान
नई पीढ़ी के लिए भी बिग बी किसी इंस्पिरेशन से कम नहीं।
-
‘मोहब्बतें’ में सख्त प्रिंसिपल,
-
‘पा’ में प्रोजेरिया से जूझता बच्चा,
-
‘पिंक’ में न्याय के लिए खड़ा वकील,
इन सभी किरदारों ने उन्हें सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश देने वाला कलाकार बना दिया।
क्षेत्रीय और एक्सपेरिमेंटल फिल्में
अमिताभ बच्चन ने बॉलीवुड तक खुद को सीमित नहीं रखा।
-
गुजराती फिल्म ‘फक्त पुरुषों खातिर’
-
तमिल फिल्म ‘वेट्टय्यान’
-
और हाल ही की तेलुगु साइ-फाई ब्लॉकबस्टर ‘कल्कि 2898 एडी’,
हर फिल्म में उनका अलग अंदाज़ देखने को मिला। ‘कल्कि’ में अश्वत्थामा का रोल उनकी बहुमुखी प्रतिभा की ताज़ा मिसाल है।
कुछ आइकॉनिक फिल्में जिन्होंने इतिहास लिखा
-
‘जंजीर’ (1973) – एंग्री यंग मैन का जन्म
-
‘दीवार’ (1975) – सिनेमा का क्लासिक और सामाजिक आईना
-
‘शोले’ (1975) – दोस्ती और ड्रामा का प्रतीक
-
‘डॉन’ (1978) – डबल रोल का करिश्मा
-
‘ब्लैक’ (2005) – भावनाओं और इंस्पिरेशन का नया आयाम
-
‘पा’ (2009) – बेमिसाल ट्रांसफॉर्मेशन
-
‘पिंक’ (2016) – समाज को न्याय का संदेश
निष्कर्ष
83 साल की उम्र में भी बिग बी वही जज़्बा और वही चमक रखते हैं, जो उन्होंने करियर की शुरुआत में दिखाई थी। 200 से अधिक फिल्मों में अलग-अलग किरदार निभाने वाले अमिताभ बच्चन सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के जीवित इतिहास हैं।
उनकी यात्रा यह साबित करती है कि –
“उम्र सिर्फ एक नंबर है, कला की कोई सीमा नहीं।”