गाजा सिटी एक बार फिर हिंसा की चपेट में आ गया है। रविवार को हमास और डोगमूश कबीले के लड़ाकों के बीच हुई भयंकर झड़प में अब तक 64 लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें 52 डोगमूश लड़ाके और 12 हमास सदस्य शामिल हैं। मारे गए लोगों में हमास के सीनियर अधिकारी बासेम नैम का बेटा भी था।
इस संघर्ष में कवरेज कर रहे फिलिस्तीनी पत्रकार सालेह अलजफरावी (28) की भी गोली लगने से मौत हो गई। उनकी मौत ने गाजा युद्ध में मारे गए पत्रकारों की संख्या को 270 से अधिक कर दिया है।
कैसे भड़की हिंसा?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, झड़प की शुरुआत तब हुई जब हमास के लड़ाकों ने गाजा सिटी के साब्रा इलाके में डोगमूश कबीले के ठिकानों पर हमला किया।
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डोगमूश कबीले का आरोप है कि हमास ने सीजफायर का फायदा उठाकर उन्हें निशाना बनाया।
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हमास ने पलटकर चेतावनी दी है कि जो लड़ाके और अपराधी आत्मसमर्पण नहीं करेंगे, उन्हें कठोर सजा दी जाएगी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस बार लोग इजराइली हमलों से नहीं, बल्कि अपने ही लोगों से भागने को मजबूर हो गए।
डोगमूश कबीला कौन है?
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डोगमूश कबीले की जड़ें तुर्किश मूल से जुड़ी मानी जाती हैं।
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यह गाजा के साब्रा और तेल अल-हवा इलाकों में बसा है और वहां का एक प्रभावशाली घराना माना जाता है।
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इस कबीले पर अलकायदा से संबंध और ब्रिटिश पत्रकार एलन जॉनस्टन व इजराइली कैदी गिलाश शालिद के अपहरण में शामिल होने के आरोप हैं।
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2008 में हमास ने इनके ठिकानों पर बड़ी कार्रवाई की थी।
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2024 में हमास ने सालेह डोगमूश की हत्या कर दी थी, जिस पर राहत सामग्री की हेराफेरी का आरोप था।
पत्रकार की हत्या
संघर्ष की रिपोर्टिंग कर रहे सालेह अलजफरावी को गोली मार दी गई।
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उनका शव प्रेस जैकेट पहने हुए एक ट्रक के पीछे मिला।
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अलजफरावी युद्ध कवरेज के लिए जाने जाते थे और हाल ही में उन्होंने खुलासा किया था कि उन्हें इजराइल से धमकियां मिल रही थीं।
इजराइल समझौते के बीच खूनखराबा
यह हिंसा उस समय हुई जब हमास और इजराइल के बीच पीस समझौते की प्रक्रिया चल रही थी।
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हमास ने घोषणा की है कि वह 20 इजराइली बंधकों को रेड क्रॉस के हवाले करेगा।
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ये बंधक रेड क्रॉस की निगरानी में इजराइली सेना को सौंपे जाएंगे और फिर उन्हें दक्षिण इजराइल ले जाया जाएगा।
✅ निष्कर्ष:
गाजा में जारी यह संघर्ष दिखाता है कि यहां केवल बाहरी दुश्मन ही नहीं, बल्कि आंतरिक झगड़े भी खूनखराबे को बढ़ा रहे हैं। एक ओर हमास और डोगमूश सत्ता और नियंत्रण की लड़ाई में भिड़े हैं, वहीं निर्दोष आम लोग और पत्रकार इस हिंसा की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं।