मुंबई। टाटा ट्रस्ट्स में एक बार फिर से अंदरूनी खींचतान तेज़ हो गई है। ट्रस्टी मेहली मिस्त्री का कार्यकाल 28 अक्टूबर को समाप्त हो रहा है, लेकिन उनकी दोबारा नियुक्ति (री-अपॉइंटमेंट) पर सहमति बनना मुश्किल दिख रहा है। सूत्रों के मुताबिक, चेयरमैन नोएल टाटा, वाइस चेयरमैन वेणु श्रीनिवासन और ट्रस्टी विजय सिंह इसके पक्ष में नहीं हैं।
कौन हैं मेहली मिस्त्री
मेहली मिस्त्री 2022 से सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) और सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) के ट्रस्टी हैं। ये दोनों ही ट्रस्ट्स, टाटा संस में 51% हिस्सेदारी रखते हैं। खास बात यह है कि मिस्त्री, साइरस मिस्त्री के चचेरे भाई और शापूरजी पलॉन्जी ग्रुप के प्रमोटर हैं। उनकी कंपनी स्टरलिंग मोटर्स, टाटा मोटर्स की डीलर भी है। शापूरजी पलॉन्जी ग्रुप खुद टाटा संस में 18.37% हिस्सेदारी रखता है।
किसने दी सहमति, किसने उठाई आपत्ति
टाटा ट्रस्ट्स के सीईओ सिद्धार्थ शर्मा ने मिस्त्री की बहाली का प्रस्ताव रखा। डेरियस खंबाटा, प्रमित झावेरी और जहांगीर एचसी जहांगीर जैसे ट्रस्टी इसके पक्ष में हैं। लेकिन नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन ने इस पर कानूनी राय मांगी है।
रतन टाटा के बाद बदल गया माहौल
रतन टाटा के निधन तक ट्रस्ट्स में फैसले हमेशा सर्वसम्मति से लिए जाते थे। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। रतन टाटा की मृत्यु के बाद, ट्रस्टीज ने बहुमत से पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह को टाटा संस बोर्ड से हटाया था। इस कदम ने दिखा दिया कि अब ट्रस्ट्स के अंदर वोटिंग और कानूनी पेच भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।
बहाली के नियम और उलझन
1932 में लिखी गई सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट की ट्रस्ट डीड के मुताबिक:
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किसी भी बैठक को वैध माने जाने के लिए कम से कम तीन ट्रस्टी का होना ज़रूरी है।
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अगर वोटिंग होती है, तो बहुमत का निर्णय मान्य होगा।
इसके अलावा, 17 अक्टूबर (रतन टाटा के निधन के 9 दिन बाद) ट्रस्टीज की बैठक में तय किया गया था कि किसी भी ट्रस्टी का कार्यकाल खत्म होने पर उसकी बहाली बिना समय सीमा के की जाएगी।
श्रीनिवासन की बहाली पर मिस्त्री की शर्त
मेहली मिस्त्री ने हाल ही में श्रीनिवासन की दोबारा बहाली को मंजूरी दी थी, लेकिन साथ में शर्त भी जोड़ दी थी। उनका कहना था कि बाकी ट्रस्टियों को भी कार्यकाल पूरा होने पर वैसा ही एकमत रेजोल्यूशन मिले, वरना उनकी मंजूरी को औपचारिक नहीं माना जाए।
अब सवाल उठ रहा है कि क्या मिस्त्री अपनी मंजूरी वापस ले सकते हैं या इस फैसले को कोर्ट में चुनौती देंगे।
कानूनी राय का मतभेद
कुछ ट्रस्टियों का मानना है कि एक बार पास हुआ रेजोल्यूशन वापस नहीं लिया जा सकता। “शर्त वाली मंजूरी कानूनी रूप से टिकती नहीं है,” एक ट्रस्टी ने साफ कहा।
कुल मिलाकर, टाटा ट्रस्ट्स में मेहली मिस्त्री की बहाली पर गंभीर मतभेद सामने आ गए हैं। रतन टाटा के बाद पहली बार ट्रस्ट्स में यह सवाल खड़ा हुआ है कि क्या फैसले सर्वसम्मति से होंगे या बहुमत से – और यही बात आने वाले समय में टाटा ग्रुप की गवर्नेंस को गहराई से प्रभावित कर सकती है।