भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा दिसंबर में अपने कार्यकाल का पहला वर्ष पूरा करने जा रहे हैं। इस दौरान वैश्विक मंदी, भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन के टूटने जैसी मुश्किल परिस्थितियों के बीच उन्होंने आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत रखने से लेकर रेपो रेट में 1% की कटौती तक, RBI ने अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाने की कोशिश की।
अमेरिका सहित कई देशों के क्रिप्टो अपनाने और बढ़ते टैरिफ पर भी मल्होत्रा का रुख साफ है। उनका कहना है कि भारत की नीतियां दुनिया के ट्रेंड्स से प्रभावित होकर नहीं, बल्कि अपनी संप्रभुता और आर्थिक ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बनती हैं। यही वजह है कि RBI क्रिप्टोकरेंसी को मान्यता देने के पक्ष में नहीं है और डिजिटल वित्तीय व्यवस्था के लिए सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को सुरक्षित विकल्प मानता है।
CBDC को लेकर उनका कहना है कि यह नोट की तरह भरोसेमंद और सुरक्षित होगा, लेकिन फिलहाल यह शुरुआती चरण में है। सीमा पार भुगतान को सरल और सस्ता बनाने की दिशा में इसकी संभावनाएं मजबूत हैं।
बैंकिंग सेक्टर पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि अगर सरकार मर्जर योजना लाती है तो RBI उसका पूरा समर्थन करेगा। बड़े बैंक कम लागत, बेहतर तकनीक और व्यापक पहुंच के कारण अधिक सुविधाएं दे सकते हैं। हालांकि छोटे बैंकों का महत्व भी भारत जैसे विविध देश में हमेशा बना रहेगा।
महंगाई और नीतिगत दरों पर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि खाद्य पदार्थों के दाम में कमी से रिटेल महंगाई नीचे आई है, लेकिन आगे की स्थितियां निर्णय निर्धारित करेंगी। एमपीसी आने वाली आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए ब्याज दरों पर फैसला लेगी।
रुपये की कमजोरी को उन्होंने प्राकृतिक बाजार उतार-चढ़ाव का हिस्सा बताया। RBI किसी तय स्तर को लक्ष्य नहीं बनाता, बस अत्यधिक उतार-चढ़ाव से बचाने का प्रयास करता है।
बेरोजगारी पर उन्होंने कहा कि पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे के अनुसार बेरोजगारी दर पहले की तुलना में काफी घटी है और RBI द्वारा उठाए गए कदमों का सकारात्मक असर अर्थव्यवस्था पर साफ दिख रहा है।
एनपीए पर बोले कि हाल के वर्षों में एसेट क्वालिटी में भारी सुधार आया है। मार्च 2025 में GNPA घटकर 2.3% और NNPA 0.5% तक पहुंच गया, जो 2018 के मुकाबले एक बड़ी उपलब्धि है।
संजय मल्होत्रा मानते हैं कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत घरेलू मांग के सहारे तेजी से बढ़ी है। बीते चार वर्षों में औसतन 8.2% की विकास दर और इस वर्ष 6.8% वृद्धि का अनुमान इस भरोसे को और मजबूत करता है।
बैंकों के बढ़ते मुनाफे और आम जनता की ईएमआई पर सवाल करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि बैंकों की ब्याज दरें लंबी अवधि में घटी हैं और अधिकांश मुनाफा बैंकिंग विस्तार में लगाया जा रहा है।
अमेरिका के 50% टैरिफ पर उन्होंने आश्वस्त किया कि भारत के चालू खाते और रुपए पर इसका बहुत मामूली असर पड़ेगा। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, बढ़ते सर्विसेज सरप्लस और रेमिटेंस ने देश की बाहरी स्थिति को सुरक्षित रखा है।
समग्र रूप से उनका संदेश यही है—भारत की आर्थिक नींव मजबूत है, कंपनियों की बैलेंस शीट और मुनाफा बेहतर हैं, और आने वाले वर्षों में विकास की रफ्तार तेज बने रहने की पूरी संभावना है।