भारत में ब्लैक फ्राइडे सेल कोई पारंपरिक त्योहार नहीं है, न ही इसका भारतीय संस्कृति से कोई सीधा संबंध है। फिर भी पिछले कुछ वर्षों में यह दिन भारतीय बाजार में एक बड़े डिजिटल शॉपिंग फेस्टिवल में बदल चुका है। आज हर ब्रांड, हर कैटेगरी और हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ब्लैक फ्राइडे का हंगामा दिख रहा है—कहीं Buy 1 Get 1, कहीं 50% ऑफ, कहीं सिर्फ नाम के लिए सेल और हाइप। यह अचानक का बदलाव नहीं, बल्कि ग्लोबल ट्रेंड्स, ऑनलाइन मार्केटिंग और मनोवैज्ञानिक रणनीतियों का मिला-जुला असर है।
अमेरिका के फिलाडेल्फिया से 1960 के दशक में शुरू हुआ ब्लैक फ्राइडे, आज भारत में क्रिसमस-न्यू ईयर शॉपिंग सीजन के बराबर चर्चा में है। दुनियाभर के ऑनलाइन स्टोर्स पर भारी डिस्काउंट मिल रहे हैं, और भारत में भी उपभोक्ता इस मौके को बड़े उत्साह से अपना रहे हैं। लेकिन इसके साथ ही ऑनलाइन फ्रॉड, नकली डिस्काउंट्स और डिजिटल ठगी का खतरा भी इसी गति से बढ़ रहा है।
दरअसल, ब्लैक फ्राइडे को भारत में लोकप्रिय बनाने की कहानी तीन बड़े फैक्टर्स पर आधारित है—ग्लोबलाइजेशन, FOMO और इन्फ्लुएंसर्स।
सबसे पहले ग्लोबल ब्रांड्स ने भारत में अपने डिस्काउंट कैलेंडर पेश किए और इंटरनेट ने इन ऑफर्स को भारतीय ग्राहकों तक पहुंचाने का रास्ता खोल दिया। इसके बाद सोशल मीडिया क्रिएटर्स ने जब ब्लैक फ्राइडे डील्स की धूम मचाई, तो यह दिन भारत में ‘साल की सबसे बड़ी सेल’ की तरह दिखने लगा। पर्सनलाइज्ड ऑनलाइन विज्ञापन, काउंटडाउन टाइमर और “आज नहीं खरीदा तो मिस कर दोगे” जैसी डिजिटल तर्ज पर बनाई गई हड़बड़ी ने इस सेल को और अधिक लोकप्रिय बना दिया।
दूसरा बड़ा कारण है FOMO—फियर ऑफ मिसिंग आउट। हर तरफ ‘आज ही’, ‘लास्ट पीस’, ‘मिडनाइट तक’ जैसे मैसेज दिखते हैं, जो व्यक्ति को तुरंत खरीदने के लिए प्रेरित करते हैं। इसी दबाव में लोग चाहते एक ही प्रोडक्ट हैं, लेकिन खरीद लेते दो-तीन। ब्लैक फ्राइडे की पूरी मशीनरी इसी मनोविज्ञान पर चलती है।
तीसरा स्तंभ हैं इन्फ्लुएंसर—जिनकी हॉल वीडियो, बेस्ट डील्स, अनबॉक्सिंग और मस्ट-बाय लिस्ट्स खरीदारी को और भी आकर्षक बना देती हैं। स्किनकेयर, कैंडल्स, फैशन से लेकर टेक गैजेट्स तक सबकुछ अचानक जरूरी महसूस होने लगता है। जितना ज्यादा स्क्रोल करें, उतनी ही ज्यादा पर्सनलाइज्ड डील्स सामने आ जाती हैं।
लेकिन इस पूरे माहौल के बीच समझदारी से खरीदारी करना सबसे जरूरी है। सबसे पहले बजट तय करें और उसी के भीतर रहने की कोशिश करें। किसी भी प्रोडक्ट को तुरंत खरीदने के बजाय पहले कार्ट में डालें और कुछ समय बाद फिर देखें कि क्या वह वास्तव में जरूरी है। देर रात की स्क्रोलिंग से बचें, क्योंकि यही समय सबसे ज्यादा इम्पल्स शॉपिंग को ट्रिगर करता है। ऐसे इन्फ्लुएंसर्स को म्यूट करना भी फायदेमंद है, जिनके कारण आप बेवजह शॉपिंग करने लगते हैं। घर में मौजूद चीजों की लिस्ट देखकर ही खरीदारी करें, ताकि दोहराव न हो।
क्या भारत में ब्लैक फ्राइडे का यह क्रेज कभी कम होगा? फिलहाल इसकी संभावना कम है, क्योंकि यह अब केवल एक सेल नहीं बल्कि ग्लोबल कल्चर, डिजिटल मार्केटिंग और मनोरंजन का मिश्रण बन चुका है। लेकिन यदि उपभोक्ता इन मनोवैज्ञानिक ट्रिगर्स को समझ लें, तो शॉपिंग का मजा भी बरकरार रहेगा और जेब पर भी अनावश्यक बोझ नहीं पड़ेगा।