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10 दिन में 33 नक्सलियों का सरेंडर, MMC जोन पूरी तरह खत्म: मिलिंद का एनकाउंटर, रामधेर-अनंत-कबीर ने डाले हथियार

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महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती इलाके में फैला कुख्यात एमएमसी जोन अब इतिहास बन चुका है। बीते दस दिनों के भीतर 33 नक्सलियों के सामूहिक आत्मसमर्पण और शीर्ष नेतृत्व के टूटने के बाद यह पूरा नेटवर्क लगभग ध्वस्त हो चुका है। सेंट्रल कमेटी के बड़े चेहरे मिलिंद तिलतुमड़े का एनकाउंटर पहले ही हो चुका है, जबकि सेंट्रल कमेटी मेंबर रामधेर, संगठन के प्रवक्ता अनंत और एसजेडसीएम कबीर ने अपने साथियों के साथ हथियार डाल दिए हैं। अब केवल छोटा दीपक और उसके साथ पांच-छह निचले स्तर के नक्सली बचे बताए जा रहे हैं, जिनके भी जल्द सरेंडर करने की संभावना जताई जा रही है।

एमएमसी जोन वह इलाका था, जिसे नक्सलियों ने साल 2014 से 2016 के बीच संगठित रूप से खड़ा किया था। यह क्षेत्र तीन राज्यों—Maharashtra, Madhya Pradesh और Chhattisgarh—के बॉर्डर पर फैला हुआ था, जहां नक्सली लंबे समय से अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे थे। शुरुआत में यहां हथियारबंद नक्सलियों की संख्या 80 से 100 के बीच मानी जाती थी। संगठन ने इस पूरे जोन को दो बड़े डिवीजन—गोंदिया-बलाघाट-राजनांदगांव और कान्हा-भोरमदेव—में बांटा था। गोंदिया-बलाघाट-राजनांदगांव डिवीजन की कमान मंगू के हाथ में थी, जबकि कान्हा-भोरमदेव डिवीजन की जिम्मेदारी सुरेंद्र उर्फ कबीर को दी गई थी। पूरे एमएमसी जोन का प्रवक्ता अनंत को बनाया गया था और इस पूरे नेटवर्क की निगरानी सेंट्रल कमेटी मेंबर मिलिंद तिलतुमड़े के हाथ में थी।

संगठन के बिखरने की शुरुआत 2021 में हुई, जब C-60 Commandos और नक्सलियों के बीच Gadchiroli में हुए एक बड़े एनकाउंटर में मिलिंद तिलतुमड़े सहित 26 नक्सली मारे गए। यह एमएमसी जोन के लिए सबसे बड़ा झटका था। इसके बाद सुरक्षाबलों का दबाव लगातार बढ़ता चला गया। साल 2023 में गोंदिया-बलाघाट-राजनांदगांव डिवीजन के प्रभारी मंगू की मौत ने संगठन को और कमजोर कर दिया। इसी दौर में नक्सल संगठन ने बीजापुर जिले के रहने वाले रामधेर को सेंट्रल कमेटी मेंबर बनाकर इस इलाके में जिम्मेदारी दी थी। रामधेर को हिड़मा से पहले सेंट्रल कमेटी में जगह देने की बात सामने आई, हालांकि संगठन ने कभी अपने पर्चों में इसका खुलकर जिक्र नहीं किया।

रामधेर उर्फ मज्जी पर एक करोड़ पांच लाख रुपए का इनाम घोषित था, जबकि हिड़मा पर एक करोड़ रुपए का इनाम रखा गया था। माना जाता है कि रामधेर को संगठन ने रणनीतिक तौर पर एमएमसी जोन में दोबारा जान डालने के लिए भेजा था, लेकिन लगातार दबाव, सीमित संसाधन और सुरक्षाबलों की घेराबंदी के चलते वह संगठन को संभाल नहीं सका। अंततः उसने भी हथियार डाल दिए और अपने 11 साथियों के साथ खैरागढ़ में सरेंडर कर दिया। सभी सरेंडर नक्सलियों का गुलाब का फूल और संविधान की प्रति देकर स्वागत किया गया और उनके कब्जे से हथियार भी बरामद किए गए, जिन पर कुल मिलाकर करीब 2.95 करोड़ रुपए का इनाम घोषित था।

अब एमएमसी जोन में केवल छोटा दीपक और उसकी एक छोटी-सी टीम के सक्रिय होने की बात सामने आ रही है। प्रशासन का मानना है कि अगर दीपक ने भी आत्मसमर्पण कर दिया, तो यह पूरा इलाका पूरी तरह नक्सलमुक्त घोषित कर दिया जाएगा। छत्तीसगढ़ सरकार का दावा है कि लगातार हो रहे इन सरेंडरों ने मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के इस सबसे संवेदनशील क्षेत्र से नक्सलियों की रीढ़ तोड़ दी है।

सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को यह सफलता उस बड़े लक्ष्य की दिशा में अहम कदम के तौर पर दिखाई दे रही है, जिसकी घोषणा केंद्र सरकार ने की है। गृह मंत्रालय का स्पष्ट लक्ष्य है कि 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद का पूरी तरह खात्मा कर दिया जाए। इसी लक्ष्य के तहत बीते एक साल में छत्तीसगढ़ में कई बड़े नक्सली कमांडर मारे जा चुके हैं और जो बचे हैं, वे या तो भाग रहे हैं या हथियार डालने को मजबूर हो रहे हैं। एमएमसी जोन का टूटना इसी अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जा रहा है।

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