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NAAC की एक्रेडिटेशन प्रक्रिया पर संसदीय पैनल सख्त, बोला– व्यवस्था बेहद लंबी, जटिल और अविश्वसनीय, तुरंत सुधार जरूरी

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देश में उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता जांच की मौजूदा व्यवस्था पर अब सीधा सवाल उठ गया है। संसदीय पैनल ने NAAC यानी नैक द्वारा की जाने वाली एक्रेडिटेशन और री-एक्रेडिटेशन प्रक्रिया को अत्यंत लंबा, जटिल और जरूरत से ज्यादा ब्यूरोक्रेटिक करार दिया है। पैनल का साफ कहना है कि इस पूरी व्यवस्था में तत्काल सुधार किए जाने की जरूरत है, क्योंकि मौजूदा प्रक्रिया न सिर्फ शिक्षण संस्थानों पर अनावश्यक बोझ डाल रही है, बल्कि नैक की विश्वसनीयता भी हाल के समय में गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।

हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन्स यानी HEIs की एक्रेडिटेशन प्रणाली की समीक्षा करते हुए संसदीय पैनल ने कहा कि वर्तमान सिस्टम इतना पेचीदा है कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों का बड़ा समय सिर्फ रिपोर्टिंग, डॉक्युमेंटेशन और साइट विजिट की तैयारी में ही खर्च हो जाता है। हर साल कई बार की रिपोर्टिंग, बार-बार की जाने वाली री-एक्रेडिटेशन प्रक्रिया और लंबी निरीक्षण टीमों की विजिट ने पूरे सिस्टम को सुस्त और बोझिल बना दिया है। पैनल का मानना है कि एक ऐसी प्रक्रिया की जरूरत है जो सरल हो, तेज हो और जिसमें गैर-जरूरी सरकारी अड़चनों की कोई जगह न हो।

नैक की ग्रेडिंग व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। पैनल का कहना है कि मौजूदा मल्टी-ग्रेड सिस्टम की जगह अगर एक स्पष्ट और बाइनरी एक्रेडिटेशन मॉडल लागू किया जाए, तो इससे न सिर्फ प्रक्रिया आसान होगी बल्कि नैक अधिकारियों के विवेकाधिकार की गुंजाइश भी कम होगी। इससे पूरे सिस्टम में पारदर्शिता बढ़ेगी और संस्थानों का भरोसा दोबारा बहाल हो सकेगा।

इस रिपोर्ट में हाल ही में सामने आए नैक से जुड़े कथित रिश्वत मामले का भी जिक्र किया गया है। पैनल ने साफ कहा कि इस पूरे प्रकरण की गहन आंतरिक जांच होनी चाहिए और उसके नतीजे संसदीय समिति के साथ साझा किए जाने चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 200 संस्थानों की ग्रेडिंग में बदलाव किया गया है और करीब 900 पीयर असेसर को हटाया जा चुका है, जो इस बात का संकेत है कि नैक की साख को गहरा झटका लगा है। पैनल का मानना है कि अगर समय रहते विश्वसनीयता बहाल नहीं की गई तो इसका सीधा असर देश के पूरे हायर एजुकेशन सिस्टम पर पड़ेगा।

इसी रिपोर्ट में UGC में नेतृत्व की कमी को लेकर भी चिंता जताई गई है। एजुकेशन, महिला, बच्चे, युवा और खेल से जुड़ी स्टैंडिंग कमिटी, जिसकी अध्यक्षता Digvijaya Singh कर रहे हैं, ने कहा है कि अप्रैल 2025 से यूजीसी के चेयरपर्सन का पद खाली पड़ा हुआ है। समिति ने सरकार को यह भी याद दिलाया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत यह स्पष्ट प्रावधान है कि नेतृत्व के पद लंबे समय तक खाली नहीं छोड़े जाने चाहिए और बदलाव के समय ओवरलैपिंग पीरियड होना चाहिए। इसलिए पैनल ने सरकार को तुरंत नया चेयरपर्सन नियुक्त करने की सिफारिश की है।

संसदीय समिति ने रिसर्च संस्थानों की हालत पर भी चिंता जताई है। ICHR, ICPR और ICSSR जैसे संस्थानों में फंड की कमी, कम फेलोशिप, कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर और लंबे समय से खाली पदों को लेकर पैनल ने गंभीर चेतावनी दी है। समिति का कहना है कि मौजूदा फंडिंग इन संस्थानों के महत्वपूर्ण शोध कार्यों के अनुरूप नहीं है।

ICHR को लेकर पैनल ने विशेष रूप से कहा है कि उसका मौजूदा बजट उसके दायित्वों की तुलना में काफी कम है और उसमें बढ़ोतरी बेहद जरूरी है। इसके साथ ही जूनियर रिसर्च फेलोशिप की स्थिति पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि पूरे देश में महज 80 छात्रों को यह फेलोशिप मिलती है और उनका मासिक स्टाइपेंड सिर्फ 17,600 रुपये है, जबकि UGC की JRF 37,000 रुपये प्रतिमाह है। समिति ने फेलोशिप की राशि और रिसर्च छात्रों की संख्या दोनों बढ़ाने की जोरदार सिफारिश की है।

कुल मिलाकर संसदीय पैनल की यह रिपोर्ट देश की हायर एजुकेशन व्यवस्था के लिए एक बड़ा चेतावनी संकेत मानी जा रही है। एक ओर जहां नैक की एक्रेडिटेशन प्रक्रिया पर सवाल खड़े हुए हैं, वहीं दूसरी ओर यूजीसी और रिसर्च काउंसिल्स में नेतृत्व, फंडिंग और पारदर्शिता की कमी को भी खुलकर उजागर किया गया है। अब सरकार के सामने असली चुनौती यह है कि वह इन सिफारिशों पर कितनी तेजी और गंभीरता से अमल करती है।

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