रायपुर में छत्तीसगढ़ की प्रमुख आवास और श्रमिक कल्याण योजनाओं को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट ने गंभीर गड़बड़ियों की परतें खोल दी हैं। कैग ने अपनी ताजा ऑडिट रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा है कि योजनाओं के क्रियान्वयन में न सिर्फ भारी लापरवाही हुई, बल्कि अपात्र लोगों को लाभ देने, धनराशि के लंबे समय तक फंसे रहने और कमजोर निगरानी व्यवस्था के कारण राज्य को करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। यह रिपोर्ट मार्च 2023 को समाप्त अवधि के लिए प्रदर्शन एवं अनुपालन ऑडिट पर आधारित है, जिसे बुधवार को छत्तीसगढ़ विधानसभा में प्रस्तुत किया गया।
रिपोर्ट में सामान्य, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों से जुड़े विभागों के खर्च का समग्र मूल्यांकन किया गया है। इसमें प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी के क्रियान्वयन पर विशेष ऑडिट, श्रम विभाग की कल्याणकारी योजनाओं की जांच, छत्तीसगढ़ अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी के माध्यम से लगाए गए सोलर पंपों का ऑडिट और लोक निर्माण विभाग से संबंधित कार्यों की पड़ताल शामिल है। कैग के मुताबिक कई योजनाओं में नीतिगत उद्देश्यों से हटकर काम हुआ, जिससे नतीजे अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहे।
महिला सशक्तिकरण को लेकर किए जा रहे दावों पर भी कैग की रिपोर्ट ने सवाल खड़े किए हैं। 2016-17 से 2023-24 के बीच आवास योजनाओं के तहत स्वीकृत मकानों में से सिर्फ 50 प्रतिशत ही महिलाओं के नाम पर स्वीकृत किए गए, जबकि योजना का उद्देश्य इससे कहीं ज्यादा था। निगरानी व्यवस्था में भी गंभीर खामियां पाई गईं, जहां गलत जियो-टैगिंग, दूसरे लाभार्थियों के मकानों की तस्वीरों का इस्तेमाल और सामाजिक ऑडिट में देरी जैसी अनियमितताएं सामने आईं।
श्रमिक कल्याण योजनाओं के ऑडिट में भी चिंताजनक तस्वीर उभरकर आई है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए आवंटित 329.41 करोड़ रुपये में से महज 64 प्रतिशत राशि का ही उपयोग किया गया। संगठित क्षेत्र के लिए उपलब्ध 44.86 करोड़ रुपये में से केवल 21.27 करोड़ रुपये खर्च किए जा सके। हैरानी की बात यह भी है कि केंद्र सरकार के ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत 76.33 लाख श्रमिकों के मुकाबले राज्य के पोर्टल पर केवल 22 प्रतिशत श्रमिकों का ही पंजीकरण पाया गया।
सोलर पंप स्थापना योजना में भी कैग ने अनावश्यक खर्च की ओर इशारा किया है। रिपोर्ट के अनुसार दिशा-निर्देशों के विपरीत महंगे डायरेक्ट करंट सोलर पंप लगाए गए, जिससे राज्य पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा। 90 हजार से अधिक पंप बिना यील्ड टेस्ट के लगाए गए और गलत चयन के कारण करीब 9.70 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार आया। वहीं लोक निर्माण विभाग के ऑडिट में कठोर चट्टान को साधारण चट्टान बताकर ठेकेदारों को अतिरिक्त भुगतान किए जाने से 3.21 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय हानि दर्ज की गई।
आवास परियोजनाओं की प्रगति भी निराशाजनक रही। साझेदारी में किफायती आवास योजनाओं में निर्माण में देरी के चलते 230.05 करोड़ रुपये की योजनागत राशि लंबे समय तक अवरुद्ध रही। झुग्गीवासियों से वसूली जाने वाली राशि में से नगरीय निकाय केवल 22.13 करोड़ रुपये ही वसूल सके, जबकि मार्च 2025 तक 17.23 करोड़ रुपये की राशि अब भी बकाया रही। लाभार्थी नेतृत्व निर्माण के तहत स्वीकृत 2.77 लाख मकानों में से 66,383 मकान या तो समर्पित कर दिए गए या निरस्त हो गए, जबकि शेष में से अप्रैल 2025 तक सिर्फ 1.84 लाख मकान ही पूरे हो सके।
कैग की रिपोर्ट में सबसे गंभीर खुलासा बिलासपुर, रायपुर और कोरबा नगर निगम तथा प्रेमनगर नगर पंचायत को लेकर हुआ है। जांच में पाया गया कि 3 लाख रुपये से अधिक वार्षिक आय वाले 71 अपात्र लाभार्थियों को आवास योजनाओं के तहत मकान आवंटित कर दिए गए। इतना ही नहीं, 250 लाभार्थियों को भूमि स्वामित्व सुनिश्चित किए बिना ही 4.05 करोड़ रुपये की सहायता राशि जारी कर दी गई। कैग के मुताबिक ये सभी मामले न सिर्फ नियमों का उल्लंघन हैं, बल्कि सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की गंभीर मिसाल भी पेश करते हैं।
कुल मिलाकर कैग की यह रिपोर्ट छत्तीसगढ़ में योजनाओं के क्रियान्वयन पर बड़े सवाल खड़े करती है और यह संकेत देती है कि अगर निगरानी और जवाबदेही को मजबूत नहीं किया गया, तो जनकल्याण के नाम पर होने वाला खर्च यूं ही गड़बड़ियों की भेंट चढ़ता रहेगा।