इंडिगो में बड़े पैमाने पर उड़ान रद्द होने के मामले में बनी जांच समिति ने महज 22 दिनों में अपनी रिपोर्ट एविएशन रेगुलेटर DGCA को सौंप दी है। समिति का गठन 5 दिसंबर को किया गया था और शुक्रवार शाम रिपोर्ट जमा होते ही मामला औपचारिक रूप से बंद माना जा रहा है, लेकिन रिपोर्ट की सामग्री फिलहाल सार्वजनिक नहीं की गई है। इसकी प्रतियां नागरिक उड्डयन मंत्री राममोहन नायडू और सचिव समीर कुमार सिन्हा को भी दी गई हैं, हालांकि सरकार ने विवरण गोपनीय रखा है।
जांच पैनल में DGCA के शीर्ष अधिकारी शामिल थे, जिन्होंने उन परिस्थितियों की गहन समीक्षा की जिनके चलते इंडिगो की उड़ानें लगातार रद्द हुईं। इस औपचारिक जांच के समानांतर एक सिस्टमैटिक रिव्यू भी कराया गया, जिसने पूरे मामले की दिशा ही बदल दी। इस रिव्यू का दावा है कि समस्या क्रू की कमी की नहीं थी, बल्कि शेड्यूलिंग और रोस्टरिंग में गड़बड़ी की वजह से ऑपरेशन चरमराया।
रिव्यू में सामने आया कि नवंबर में इंडिगो ने अपने 307 एयरबस विमानों के संचालन के लिए 4,575 पायलट तैनात किए थे, जबकि ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिस के अनुसार जरूरत 3,684 पायलटों की होती है। यानी एयरलाइन के पास मानक से 891 पायलट ज्यादा थे। सामान्य परिस्थितियों में ऑपरेशन, ट्रेनिंग, छुट्टियों और इमरजेंसी को कवर करने के लिए हर विमान पर छह क्रू सेट रखे जाते हैं, और इस कसौटी पर भी इंडिगो की तैनाती पर्याप्त बताई गई।
रिव्यू में यह भी दर्ज किया गया कि रेगुलेशन के मुताबिक जहां एक क्रू का मासिक उपयोग 100 घंटे तक हो सकता है, वहीं इंडिगो में यह औसतन 55% ही रहा। DGCA के न्यूनतम मानकों के अनुसार नवंबर में इंडिगो की पूरी फ्लीट के लिए करीब 1,842 पायलट ही पर्याप्त थे, जो एयरलाइन के पास मौजूद संख्या से आधे से भी कम हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि उड़ान रद्द होने की असली वजह पायलटों की उपलब्धता नहीं, बल्कि रोस्टरिंग और शेड्यूल मैनेजमेंट की चूक थी—यही बात एयरलाइन ने अपने जवाब में भी रेगुलेटर को बताई थी।
इस बीच यात्रियों की नाराजगी को शांत करने के लिए IndiGo ने प्रभावित यात्रियों को 10,000 रुपये के ट्रैवल वाउचर जारी करने शुरू कर दिए हैं, जो 12 महीने तक वैध रहेंगे और इंडिगो की किसी भी फ्लाइट में इस्तेमाल किए जा सकेंगे। गौरतलब है कि दिसंबर की शुरुआत में महज छह दिनों के भीतर 5,000 से ज्यादा उड़ानें रद्द हो गई थीं, जिससे देशभर में हजारों यात्री फंस गए थे और एविएशन सेक्टर में हड़कंप मच गया था। अब सबकी नजर इस पर है कि गोपनीय रखी गई जांच रिपोर्ट के आधार पर नियामक और सरकार आगे क्या ठोस कदम उठाते हैं।