बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जनहित याचिकाओं को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अब पीआईएल दायर करने पर याचिकाकर्ताओं को ₹15 हजार की सुरक्षा राशि जमा करनी ही होगी। इस रकम को कम करने या माफ करने संबंधी याचिका को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने दो टूक कहा कि यदि मामला वास्तव में जनहित का साबित होता है तो यह राशि बाद में लौटाई जा सकती है, लेकिन शुरुआती शर्त के तौर पर इसे अनिवार्य रखा जाएगा।
शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद वर्मा की खंडपीठ के समक्ष कोरबा के लक्ष्मी चौहान, अरुण श्रीवास्तव और सपूरन दास द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। यह याचिका कोरबा जिला डीएमएफ फंड में कथित अनियमितताओं से जुड़ी है, जिसमें पिछले दस वर्षों में लगभग 4000 करोड़ रुपये के उपयोग को नियमों और गाइडलाइंस के विरुद्ध बताया गया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि डीएमएफ फंड के तहत रोजगार और विकास कार्यों में प्रभावित लोगों को दरकिनार किया गया और मनमाने ढंग से भवन निर्माण व अन्य मदों में खर्च किया गया।
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने दलील दी कि पहले यह सुरक्षा राशि ₹5 हजार थी, जिसे अचानक तीन गुना बढ़ाकर ₹15 हजार कर दिया गया है, इसलिए इसे कम किया जाए। हालांकि खंडपीठ ने इस मांग से सहमति जताने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि गंभीर आरोपों और बड़े सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों में याचिका दायर करने वालों को तय सुरक्षा राशि जमा करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सुनवाई के बाद यह पाया जाता है कि याचिका जनहित में नहीं थी या निराधार है, तो उसे स्वतः खारिज किया जा सकता है। वहीं, अगर यह साबित होता है कि मामला वास्तविक जनहित का है, तो जमा की गई राशि याचिकाकर्ताओं को वापस कर दी जाएगी। आदेश में यह निर्देश भी दिया गया कि याचिकाकर्ता अगले शुक्रवार तक ₹15 हजार की राशि जमा करें, जिसके बाद 12 जनवरी को मामले की अगली सुनवाई होगी।
इस फैसले को हाईकोर्ट का यह संदेश माना जा रहा है कि जनहित याचिकाओं के नाम पर दायर होने वाले हल्के या गैर-जरूरी मामलों पर अब सख्ती बरती जाएगी, ताकि अदालत का समय और संसाधन वास्तविक सार्वजनिक हित के मामलों पर केंद्रित रह सकें।