छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक बार फिर भाषा, आस्था और मर्यादा को लेकर तीखा विवाद खड़ा हो गया है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा उपमुख्यमंत्री अरुण साव की ‘बंदर’ से तुलना वाले बयान ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। इस टिप्पणी को छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ ने अपने समाज के सम्मान पर हमला बताया है और भूपेश बघेल से सार्वजनिक माफी की मांग कर दी है। संघ के अध्यक्ष नीरेंद्र साहू ने चेतावनी दी है कि अगर दस दिनों में माफी नहीं मांगी गई, तो राज्यभर में आंदोलन किया जाएगा और सभी जिलों में पुलिस अधीक्षकों को ज्ञापन सौंपे जाएंगे।
साहू समाज के तेवरों के बाद कांग्रेस बैकफुट पर नजर आई। पार्टी के संचार विभाग प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने सफाई देते हुए कहा कि भूपेश बघेल ने किसी समाज का अपमान नहीं किया, बल्कि एक कहानी का उदाहरण दिया था। उन्होंने साहू समाज से अपील की कि पूरे वीडियो को देखकर ही निष्कर्ष निकाला जाए और राजनीतिक आलोचना को जाति या धर्म से जोड़कर न देखा जाए।
इधर, सत्ताधारी दल ने कांग्रेस पर हमला तेज कर दिया है। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि भूपेश बघेल जैसे वरिष्ठ नेता से ऐसी भाषा की उम्मीद नहीं की जाती। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जैसे वे भाषा की मर्यादा नहीं समझते, वैसे ही भ्रष्टाचार में भी उन्होंने सीमाएं नहीं समझीं। वहीं अरुण साव ने साफ कहा कि राजनीति में असहमति हो सकती है, लेकिन इस तरह की भाषा अक्षम्य है। कांग्रेस नेता टी.एस. सिंहदेव ने माना कि टिप्पणी किसी समाज पर नहीं बल्कि एक व्यक्ति पर थी, फिर भी इसे एक चूक बताया।
इसी बीच राजधानी रायपुर से जुड़ा एक दूसरा मामला भी सियासत और आस्था की बहस को और हवा दे रहा है। बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने ऑन-ड्यूटी थाना प्रभारी द्वारा उनके पैर छूने पर हुई विभागीय कार्रवाई पर नाराजगी जताई है। उन्होंने इसे ‘आस्था बनाम अनुशासन’ की गलत व्याख्या करार देते हुए कहा कि वर्दी के भीतर भी इंसान होता है और उसकी अपनी धार्मिक आस्था होती है। उनका सवाल था कि क्या वर्दी पहनने के बाद इंसान अपने माता-पिता, गुरु या ईष्ट को प्रणाम करने का अधिकार खो देता है?
दरअसल, 25 दिसंबर को रायपुर एयरपोर्ट पर हनुमंत कथा के लिए पहुंचे धीरेंद्र शास्त्री के स्वागत के दौरान माना थाना प्रभारी मनीष तिवारी ने जूता-टोपी उतारकर उनके पैर छुए थे। इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर कार्रवाई की मांग उठी और पुलिस विभाग ने अनुशासनात्मक कदम उठाया। बागेश्वर बाबा ने इसे बेवजह का विवाद बताते हुए पुलिसकर्मियों के त्याग और सेवा भावना का भी जिक्र किया।
कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों एक ओर भाषा और मर्यादा को लेकर संग्राम है, तो दूसरी ओर आस्था और प्रशासनिक अनुशासन की सीमाओं पर बहस छिड़ी हुई है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह विवाद राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित रहता है या सड़क पर उतरकर नए सियासी समीकरण गढ़ता है।