भारत में हेल्थ इंश्योरेंस को लेकर जो बदलाव सालों में धीरे-धीरे आना चाहिए था, वह अब एक झटके में दिखने लगा है। इसकी सबसे बड़ी वजह बनी है हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर जीएसटी का हटना। इस फैसले ने सिर्फ पॉलिसियों को सस्ता नहीं किया, बल्कि लोगों की सोच को भी पूरी तरह बदल दिया है। अब हेल्थ इंश्योरेंस को केवल औपचारिकता या मजबूरी के तौर पर नहीं, बल्कि लंबे समय की आर्थिक सुरक्षा के रूप में देखा जा रहा है।
2025 के अंत तक के आंकड़े इस बदलाव की गहराई साफ दिखाते हैं। बीते दौर में जहां लोग सीमित कवरेज वाली पॉलिसियों से काम चला लेते थे, वहीं अब औसत हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज में 31 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पहले करीब 14.5 लाख रुपये तक सिमटी रहने वाली औसत कवरेज अब लगभग 19 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है। यह हाल के वर्षों में सुरक्षा स्तरों में देखी गई सबसे तेज छलांग मानी जा रही है, जो सीधे तौर पर जीएसटी राहत का असर दिखाती है।
इस बदलाव का सबसे स्पष्ट संकेत कम कवरेज वाली पॉलिसियों से बढ़ती दूरी के रूप में सामने आया है। 10 लाख रुपये से कम सम इंश्योर्ड वाली पॉलिसियों का चलन तेजी से घटा है। जीएसटी हटने के तुरंत बाद इनकी हिस्सेदारी में 24 फीसदी की गिरावट आई, जबकि साल-दर-साल आधार पर यह कमी 29 फीसदी तक पहुंच गई। बढ़ते इलाज खर्च और मेडिकल महंगाई ने लोगों को यह एहसास करा दिया है कि कम कवरेज अब किसी काम का नहीं रह गया है।
इसके ठीक उलट, मिड और हाई कवरेज वाली पॉलिसियों की मांग में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है। 10 से 25 लाख रुपये की हेल्थ पॉलिसियों में जीएसटी हटने के बाद करीब 47 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि 25 लाख रुपये और उससे ऊपर के कवरेज वाली योजनाओं में तो 85 फीसदी तक की छलांग लगी है। सालाना तुलना करें तो भी यही रुझान दिखता है, जहां 10 से 25 लाख वाली पॉलिसियां 55.6 फीसदी और 25 लाख से ऊपर की योजनाएं करीब 49.3 फीसदी तक बढ़ी हैं। साफ है कि लोग अब इलाज की वास्तविक लागत को समझने लगे हैं।
एक और बड़ा बदलाव लंबी अवधि की पॉलिसियों को लेकर दिखा है। अब एक साल की जगह मल्टी-ईयर पॉलिसियों को प्राथमिकता दी जा रही है, ताकि बार-बार रिन्यूअल की झंझट न हो और भविष्य में प्रीमियम बढ़ने का जोखिम भी कम रहे। चार साल की पॉलिसियों में 56 फीसदी और पांच साल की पॉलिसियों में 62 फीसदी तक की बढ़ोतरी इस सोच में आए बदलाव को साफ दर्शाती है।
सबसे चौंकाने वाला ट्रेंड अनलिमिटेड हेल्थ इंश्योरेंस प्लान्स को लेकर सामने आया है। जो योजनाएं पहले बेहद सीमित वर्ग तक सिमटी रहती थीं, वे अब तेजी से मुख्यधारा में आ रही हैं। 2025 में कुल खरीदी गई हेल्थ पॉलिसियों में इनका हिस्सा 15.7 फीसदी तक पहुंच चुका है, जबकि 2024 में यह आंकड़ा महज 2 फीसदी के आसपास था। ज्यादा प्रीमियम के बावजूद जीएसटी राहत ने इन प्लान्स को अपनाने की हिचक काफी हद तक खत्म कर दी है।
दिलचस्प बात यह है कि यह बदलाव सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं रहा। टियर-3 शहरों से आने वाली हिस्सेदारी बढ़कर 70 फीसदी तक पहुंच गई है, जो पिछले साल 63.5 फीसदी थी। महामारी के बाद बदली सोच, इलाज पर बढ़ता खर्च और बेहतर वित्तीय जागरूकता ने छोटे शहरों और कस्बों में भी हेल्थ इंश्योरेंस को प्राथमिकता बना दिया है। Policybazaar जैसे प्लेटफॉर्म्स के आंकड़े भी इसी ट्रेंड की पुष्टि करते हैं।
कुल मिलाकर, जीएसटी राहत ने हेल्थ इंश्योरेंस बाजार में सिर्फ कीमतों का संतुलन नहीं बदला, बल्कि लोगों के नजरिए में भी बड़ा परिवर्तन किया है। अब हेल्थ इंश्योरेंस को खर्च नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा के निवेश के रूप में देखा जा रहा है। अगर यह रुझान ऐसे ही जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में हेल्थ इंश्योरेंस भारतीय परिवारों की फाइनेंशियल प्लानिंग की रीढ़ बन सकता है।