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सरगुजा कांग्रेस में गहराता अंतर्विरोध, ‘महाराजा’ व्हाट्सऐप ग्रुप विवाद पर सिंहदेव की दो-टूक

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छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान एक बार फिर सतह पर आ गई है। अंबिकापुर में सक्रिय ‘सरगुजा महाराजा’ व्हाट्सऐप ग्रुप को लेकर उठे विवाद ने पार्टी की गुटबाजी को खुलकर सामने ला दिया है। आरोप है कि इस ग्रुप में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के समर्थकों को हटाने की सलाह दी जा रही थी, जिस पर अब पूर्व उपमुख्यमंत्री टी एस सिंहदेव की प्रतिक्रिया सामने आई है।

सिंहदेव ने साफ शब्दों में कहा कि वे विचारों के आदान-प्रदान के पक्षधर हैं और स्वस्थ लोकतंत्र में मतभेद होना स्वाभाविक है। उन्होंने बताया कि यह मामला कल उनके संज्ञान में आया और तब यह भी स्पष्ट हुआ कि वे स्वयं उस ग्रुप के एडमिन हैं। सिंहदेव के मुताबिक, मतांतर स्वच्छ विचारों के साथ होना चाहिए, लेकिन यदि कोई व्यक्ति आपत्तिजनक टिप्पणी करता है, तो उसे ग्रुप से हटाना पूरी तरह उचित है। उनके इस बयान को पार्टी के भीतर अनुशासन और मर्यादा की स्पष्ट लाइन के रूप में देखा जा रहा है।

इसी दौरान सिंहदेव ने चैतन्य बघेल की रिहाई से जुड़े सवाल पर भी केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया Enforcement Directorate के दुरुपयोग जैसी लगती है। सिंहदेव का कहना था कि जांच अभी चल रही है, दोष सिद्ध नहीं हुआ है, ऐसे में इस तरह की कार्रवाइयां न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ हैं। उनके मुताबिक, इस तरह के कदम केवल राजनीतिक दबाव बनाने के उद्देश्य से उठाए जा रहे हैं, जो न तो नैतिक हैं और न ही कानून की भावना के अनुरूप।

मनरेगा का नाम बदलकर रूरल आजीविका मिशन किए जाने के मुद्दे पर भी सिंहदेव ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि मनरेगा कोई साधारण योजना नहीं, बल्कि नागरिकों को दिया गया एक अधिकार था। उस अधिकार को खत्म कर उसे एक मिशन में बदल दिया गया और अब उसमें भगवान राम का नाम जोड़ दिया गया है। सिंहदेव ने इसे छल करार देते हुए कहा कि भगवान राम का इस तरह किसी प्रशासनिक मिशन से कोई लेना-देना नहीं है और धार्मिक भावनाओं को योजनाओं से जोड़ना जनता को गुमराह करने जैसा है।

कुल मिलाकर, सरगुजा से उठा यह विवाद केवल एक व्हाट्सऐप ग्रुप तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान, नेतृत्व के मतभेद और राजनीतिक रणनीति को लेकर गहरे सवाल खड़े कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि पार्टी नेतृत्व इस अंदरूनी टकराव को किस तरह संभालता है और क्या सरगुजा की राजनीति में संतुलन लौट पाता है या नहीं।

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