छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में सुरक्षा बलों ने नक्सल नेटवर्क पर अब तक का एक और बड़ा और निर्णायक प्रहार किया है। सुकमा के दक्षिणी अंचल में हुई मुठभेड़ के बाद CYPC और DVCM स्तर के कुख्यात कैडरों समेत कुल 12 नक्सलियों के शव बरामद किए गए हैं। मारे गए माओवादियों में DVCM वेट्टी मंगडू उर्फ मुक्का और ACM माड़वी हितेश जैसे शीर्ष चेहरे शामिल हैं, जिन पर कुल मिलाकर 60 लाख रुपये का इनाम घोषित था। मुठभेड़ में ढेर किए गए 12 नक्सलियों में पांच महिला नक्सली भी शामिल हैं, जो इस नेटवर्क की गहराई और क्रूरता को दर्शाता है।
सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक ये वही माओवादी हैं, जो शहीद अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक आकांश राव गिरिपुंजे की IED ब्लास्ट में हत्या की साजिश में सीधे तौर पर शामिल थे। आतंक का पर्याय बन चुके DVCM वेट्टी मंगडू उर्फ मुक्का सुकमा जिले में 41 संगीन मामलों में वांटेड था, जबकि ACM माड़वी हितेश पर 14 गंभीर मामलों का रिकॉर्ड था। दोनों अपने दस्ते के साथ कई बड़ी हिंसक वारदातों और निर्दोष ग्रामीणों की हत्याओं में शामिल रहे हैं।
मुठभेड़ स्थल से भारी मात्रा में घातक हथियार भी बरामद किए गए हैं, जिनमें AK-47, INSAS और SLR राइफल्स शामिल हैं। यह बरामदगी साफ संकेत देती है कि माओवादी किसी बड़े हमले की तैयारी में थे, जिसे सुरक्षा बलों ने समय रहते नाकाम कर दिया। पुलिस के अनुसार यह कार्रवाई पुख्ता खुफिया सूचना के आधार पर की गई, जिसमें सुकमा DRG की टीमें किस्टाराम थाना क्षेत्र के अंतर्गत पामलूर के जंगलों में रवाना की गई थीं। अभियान के दौरान सुबह करीब 08:00 बजे से सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच रुक-रुक कर मुठभेड़ होती रही, जिसका अंत माओवादियों के भारी नुकसान के रूप में हुआ।
इस पूरे ऑपरेशन की जानकारी देते हुए किरण चव्हाण ने कहा कि बस्तर क्षेत्र में शांति और स्थिरता की दिशा में निरंतर और निर्णायक प्रगति हो रही है। उन्होंने स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि हिंसा का कोई भविष्य नहीं है और संवैधानिक व लोकतांत्रिक मूल्यों के रास्ते पर चलकर ही बस्तर आगे बढ़ सकता है। उन्होंने अब भी हिंसा के रास्ते पर चल रहे माओवादी कैडरों से अपील की कि वे समय रहते मुख्यधारा में लौटें और विकास, विश्वास और सौहार्द के अभियान का हिस्सा बनें।
कुल मिलाकर, सुकमा की यह मुठभेड़ न सिर्फ नक्सल नेटवर्क की कमर तोड़ने वाली साबित हुई है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि बस्तर में सुरक्षा बलों की रणनीति अब निर्णायक मोड़ पर है। जमीन पर बढ़ता दबाव, सटीक खुफिया इनपुट और लगातार सफल ऑपरेशनों ने यह साफ कर दिया है कि हिंसा का रास्ता चुनने वालों के लिए अब बस्तर में कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं बचा है।