जेईई परीक्षा 2025 से जुड़े विवाद पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपना रुख पूरी तरह साफ कर दिया है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी के खिलाफ दायर रिट याचिका को खारिज करने वाले एकल न्यायाधीश के आदेश को सही ठहराते हुए उसमें किसी भी तरह के हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है। इस फैसले के साथ ही जेईई 2025 को लेकर उठे कथित अनियमितताओं के आरोपों पर न्यायिक स्तर पर फिलहाल विराम लग गया है।
दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला शामिल थे, ने दो जेईई अभ्यर्थियों की उस अपील पर सुनवाई की, जिसमें उन्होंने National Testing Agency के खिलाफ याचिका खारिज किए जाने को चुनौती दी थी। इन याचिकाओं में 2025 की प्रवेश परीक्षा से जुड़े स्कोरकार्ड और उत्तर पत्रों में अनियमितताओं का दावा किया गया था।
हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ताओं पर लगाए गए जुर्माने के तरीके में आंशिक संशोधन किया। पहले के आदेश में जुर्माने की बात कही गई थी, लेकिन खंडपीठ ने उसे बदलते हुए दोनों अपीलकर्ताओं को एक महीने की सामुदायिक सेवा करने का निर्देश दिया। एक अपीलकर्ता को 15 मई से 15 जून तक प्रतिदिन सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे के बीच वृद्धाश्रम में सेवा करने का आदेश दिया गया, जबकि दूसरे को गाजियाबाद स्थित एक बाल देखभाल केंद्र में समान अवधि के लिए सामुदायिक सेवा करने को कहा गया।
अदालत ने इस मामले में National Cyber Forensic Laboratory की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया। फोरेंसिक रिपोर्ट में यह पाया गया कि कथित स्कोरकार्ड डाउनलोड से जुड़े अहम ब्राउज़र लॉग अपीलकर्ताओं के डिवाइस से गायब थे, जिससे उनके दावों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हुए। इसी आधार पर एकल न्यायाधीश ने पहले ही याचिका को खारिज कर दिया था।
खंडपीठ ने अपने फैसले में साफ कहा कि एकल न्यायाधीश द्वारा दिए गए तर्क और निष्कर्षों में कोई खामी नजर नहीं आती। अदालत के मुताबिक, छात्रों द्वारा किए गए दावे न सिर्फ गणितीय रूप से असंगत थे, बल्कि स्थापित परीक्षा प्रक्रियाओं के भी विपरीत थे। साथ ही, यह भी कहा गया कि ऐसे विवादित तथ्य और हेरफेर के आरोप संवैधानिक अदालत के रिट अधिकार क्षेत्र में तय नहीं किए जा सकते।
एनटीए की ओर से यह दलील भी दी गई कि दोनों उम्मीदवारों को भले ही 2025 और 2026 की जेईई परीक्षाओं में बैठने से रोका गया हो, लेकिन उन्हें किसी अन्य परीक्षा में शामिल होने से नहीं रोका गया है। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रतिबंध को उनके भविष्य के शैक्षणिक जीवन पर किसी तरह के स्थायी कलंक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले ने यह संदेश साफ कर दिया है कि बिना ठोस और प्रमाणित साक्ष्यों के परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं को न्यायिक संरक्षण नहीं मिलेगा। साथ ही, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सख्त रुख जरूरी है, लेकिन छात्रों के भविष्य को पूरी तरह बाधित करने का इरादा नहीं है।