रूस से कच्चे तेल के आयात में भारत की हालिया कटौती को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने एक बार फिर सियासी और कूटनीतिक हलचल तेज कर दी है। ट्रम्प ने खुले तौर पर कहा कि भारत ने यह कदम उन्हें खुश करने के लिए उठाया, क्योंकि प्रधानमंत्री Narendra Modi जानते थे कि वह इस मुद्दे पर नाराज़ हैं। ट्रम्प के मुताबिक, भारत-अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्ते हैं और जरूरत पड़ने पर टैरिफ बढ़ाने का विकल्प अमेरिका के पास हमेशा मौजूद है।
यूक्रेन युद्ध के बाद भारत दुनिया में रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार बनकर उभरा था। इसी को लेकर अमेरिकी प्रशासन की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि भारत रूसी तेल खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन पर हो रहे हमलों को फंड कर रहा है। इसी नाराज़गी के चलते ट्रम्प प्रशासन ने भारत पर भारी टैरिफ लगाए थे और इस मुद्दे को कई बार सार्वजनिक मंचों पर उठाया गया।
करीब चार साल बाद अब भारत ने रूस से तेल आयात में साफ कटौती की है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात लगभग 17.7 लाख बैरल प्रतिदिन था, जो दिसंबर में घटकर करीब 12 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले महीनों में यह आंकड़ा 10 लाख बैरल प्रतिदिन से भी नीचे जा सकता है। जनवरी के आंकड़ों में इस गिरावट के और गहरे होने की संभावना जताई जा रही है।
इस बदलाव के पीछे अमेरिकी प्रतिबंधों की भी बड़ी भूमिका मानी जा रही है। नवंबर के बाद रूस की दो दिग्गज तेल कंपनियों Rosneft और Lukoil पर अमेरिकी पाबंदियां सख्त हुईं, जिसके बाद भारत का रूस से तेल आयात धीरे-धीरे कम होने लगा। वहीं दूसरी ओर, रूस ने भी वह भारी डिस्काउंट देना बंद कर दिया, जिसने पहले भारत को बड़े पैमाने पर रूसी तेल खरीदने के लिए आकर्षित किया था।
यूक्रेन युद्ध के शुरुआती दौर में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं, तब रूस 20 से 25 डॉलर प्रति बैरल तक की छूट दे रहा था। लेकिन अब वैश्विक कीमतें करीब 63 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई हैं और रूस की छूट घटकर महज 1.5 से 2 डॉलर रह गई है। इस कम अंतर में भारत को पहले जैसा आर्थिक फायदा नहीं मिल रहा, ऊपर से रूस से तेल लाने में शिपिंग और बीमा लागत भी ज्यादा पड़ती है।
इसी गणित के चलते भारत अब दोबारा Saudi Arabia, United Arab Emirates और United States जैसे स्थिर और भरोसेमंद सप्लायर्स की ओर लौटता दिख रहा है। कीमतों में अंतर कम होने के साथ-साथ सप्लाई चेन की स्थिरता भी भारत के फैसले में अहम फैक्टर बन गई है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारत-अमेरिका टैरिफ विवाद भी अहम मोड़ पर है। अमेरिका अब तक भारत पर कुल 50% टैरिफ लगा चुका है, जिसमें 25% रेसिप्रोकल टैरिफ और 25% रूसी तेल खरीदने से जुड़ी पेनाल्टी शामिल है। इसका असर भारतीय निर्यात पर साफ दिख रहा है। भारत चाहता है कि यह कुल टैरिफ घटकर 15% रह जाए और रूसी तेल पर लगाई गई अतिरिक्त 25% पेनाल्टी पूरी तरह खत्म हो। दोनों देशों के बीच ट्रेड डील को लेकर बातचीत जारी है और नए साल में किसी ठोस फैसले की उम्मीद जताई जा रही है।
कुल मिलाकर, ट्रम्प के बयान से साफ है कि ऊर्जा, व्यापार और भू-राजनीति अब एक-दूसरे से गहराई से जुड़ चुके हैं। भारत का रूसी तेल आयात घटाना सिर्फ आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक संतुलन और कूटनीतिक दबावों का भी संकेत देता है।