Supreme Court of India ने अजमेर शरीफ दरगाह से जुड़ी एक याचिका पर साफ और दोटूक रुख अपनाते हुए उसे खारिज कर दिया। यह याचिका केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री को सूफी संत Khwaja Moinuddin Chishti की मजार पर सालाना उर्स के दौरान रस्मी चादर चढ़ाने से रोकने की मांग को लेकर दायर की गई थी। अदालत ने कहा कि इस याचिका में उठाया गया मुद्दा “न्यायसंगत नहीं” है और इस आधार पर आगे सुनवाई की आवश्यकता नहीं बनती।
मामले की सुनवाई Justice Suryakant और Justice Joymalya Bagchi की पीठ ने की। पीठ ने संक्षिप्त सुनवाई के बाद कहा कि याचिका में उठाए गए सवाल न्यायिक हस्तक्षेप के योग्य नहीं हैं, इसलिए इसे खारिज किया जाता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश का किसी अन्य लंबित मामले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह जनहित याचिका विश्व वैदिक सनातन संघ के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह की ओर से, अधिवक्ता बरुण कुमार सिन्हा के माध्यम से दाखिल की गई थी। याचिका में दावा किया गया था कि प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार द्वारा अजमेर शरीफ दरगाह पर चादर चढ़ाना लोगों की इच्छा, देश की संप्रभुता और संविधान के मूल्यों के खिलाफ है। साथ ही इसमें ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को दिए जा रहे सरकारी सम्मान, आधिकारिक सुरक्षा और प्रतीकात्मक मान्यता पर भी सवाल उठाए गए थे।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष ने तर्क दिया कि अजमेर शरीफ दरगाह संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत संरक्षित धार्मिक पंथ के रूप में योग्य नहीं है। इसके समर्थन में 1961 के एक संविधान पीठ के फैसले का हवाला भी दिया गया। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को इस स्तर पर स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अजमेर शरीफ दरगाह को हिंदू मंदिर बताए जाने से जुड़ा एक अलग मुकदमा पहले से ही अजमेर की सिविल कोर्ट में लंबित है। अदालत ने साफ किया कि इस याचिका को खारिज करने का उस लंबित मुकदमे पर कोई असर नहीं पड़ेगा और वह अपने स्तर पर आगे बढ़ता रहेगा।
गौरतलब है कि अजमेर शरीफ दरगाह पर प्रधानमंत्री की ओर से चादर पेश करने की परंपरा दशकों पुरानी है, जिसका पालन मौजूदा सरकार भी कर रही है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि दरगाह एक कथित ध्वस्त शिव मंदिर की जगह पर बनी है और ऐसे विवादित ढांचे पर सरकारी स्तर से चादर भेजना निष्पक्ष सुनवाई को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को फिलहाल न्यायिक हस्तक्षेप के योग्य नहीं माना।
इस फैसले के साथ शीर्ष अदालत ने यह संकेत दिया है कि धार्मिक परंपराओं और सरकारी रस्मों से जुड़े ऐसे मामलों में, जब तक ठोस और न्यायसंगत कानूनी आधार न हो, तब तक अदालत हस्तक्षेप नहीं करेगी।