इलेक्ट्रिक बाइक अब सिर्फ एक ट्रेंड नहीं रह गई है, बल्कि शहरों में रोज़मर्रा की आवाजाही का भरोसेमंद साधन बनती जा रही है। बढ़ते पेट्रोल दाम, कम मेंटेनेंस और साइलेंट राइड ने इसे लोगों की पसंद बना दिया है। लेकिन ई-बाइक खरीदते समय अगर कुछ बुनियादी बातों को नजरअंदाज कर दिया गया, तो बाद में पछताना पड़ सकता है। इसलिए फैसला लेने से पहले अपनी जरूरत और बाइक की काबिलियत—दोनों को सही तरह समझना बेहद जरूरी है।
सबसे पहले यह साफ कर लें कि आपकी रोज़ की यात्रा कितनी है और किन हालात में बाइक चलनी है। अगर रोज़ का सफर 30–40 किलोमीटर का है तो जरूरत अलग होगी, जबकि 60–80 किलोमीटर की नियमित आवाजाही के लिए ज्यादा रेंज वाली ई-बाइक बेहतर रहती है। अक्सर ऐसा देखा गया है कि EV लेने के बाद लोग ज्यादा चलाने लगते हैं, इसलिए सिर्फ आज की जरूरत नहीं, आने वाले समय को भी ध्यान में रखकर फैसला करना समझदारी है।
इसके बाद सबसे अहम मुद्दा आता है रेंज और बैटरी का। कंपनियां भले ही 120 या 150 किलोमीटर की रेंज का दावा करें, लेकिन हकीकत में ट्रैफिक, सड़क की हालत, राइडिंग स्टाइल और वजन के हिसाब से रियल-वर्ल्ड रेंज कम हो जाती है। आमतौर पर कंपनी के दावे का करीब दो-तिहाई ही असली रेंज मिलती है। इसलिए सिर्फ कागज़ी आंकड़ों पर भरोसा न करें, टेस्ट राइड लें और मौजूदा यूजर्स के अनुभव जरूर जानें।
बैटरी किसी भी इलेक्ट्रिक बाइक का सबसे महंगा हिस्सा होती है। ज़्यादातर ई-बाइक्स में लिथियम-आयन बैटरी मिलती है, जिस पर सीमित साल या किलोमीटर की वारंटी होती है। खरीदते समय यह समझना जरूरी है कि बैटरी की परफॉर्मेंस कितनी गिरने पर वारंटी खत्म मानी जाएगी और वारंटी के बाद नई बैटरी पर कितना खर्च आ सकता है। यही बात लंबे समय में आपकी जेब पर सबसे ज्यादा असर डालती है।
चार्जिंग सुविधा भी उतनी ही अहम है। अधिकतर इलेक्ट्रिक बाइक घर के सामान्य सॉकेट से चार्ज हो जाती हैं, लेकिन बैटरी के साइज के हिसाब से चार्जिंग में 4 से 8 घंटे तक लग सकते हैं। फास्ट चार्जिंग का फीचर तभी काम का है, जब आपके शहर में उस ब्रांड के चार्जिंग पॉइंट्स मौजूद हों। वरना यह सिर्फ एक नाम भर रह जाता है।
सरकारी सब्सिडी और रनिंग कॉस्ट को लेकर भी साफ-साफ जानकारी रखें। कई बार कीमत सब्सिडी के साथ बताई जाती है और बाद में भ्रम पैदा होता है। एक बात तय है कि लंबे समय में बिजली का खर्च और मेंटेनेंस पेट्रोल बाइक से काफी कम होता है, लेकिन शुरुआती कीमत और सब्सिडी की स्थिति समझना जरूरी है।
परफॉर्मेंस के मामले में इलेक्ट्रिक बाइक का इंस्टेंट टॉर्क शहर की ट्रैफिक में बड़ा फायदा देता है। पिकअप अच्छा होता है, लेकिन इसके साथ ब्रेकिंग और सस्पेंशन भी उतने ही मजबूत होने चाहिए। टेस्ट राइड के दौरान सिर्फ एक्सीलेरेशन नहीं, बल्कि ब्रेक की पकड़ और खराब सड़कों पर बाइक का व्यवहार भी जरूर परखें।
आखिर में बिल्ड क्वालिटी और सर्विस नेटवर्क को हल्के में न लें। भारतीय सड़कों पर बाइक की मजबूती, नजदीकी सर्विस सेंटर और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता बहुत मायने रखती है। हाई-टेक फीचर्स अच्छे लगते हैं, लेकिन बेसिक कंट्रोल्स का भरोसेमंद और फिजिकल होना रोज़मर्रा के इस्तेमाल में ज्यादा काम आता है।
कुल मिलाकर, इलेक्ट्रिक बाइक एक समझदारी भरा फैसला हो सकता है—बस शर्त यह है कि खरीदने से पहले सही सवाल पूछे जाएं और सिर्फ प्रचार नहीं, हकीकत को देखकर निर्णय लिया जाए।