कर्मचारियों के भविष्य निधि संगठन यानी Employees’ Provident Fund Organisation ने पीएफ निकासी से जुड़े नियमों को पहले के मुकाबले काफी सरल बना दिया है। जहां पहले निकासी के लिए 13 अलग-अलग कैटेगरी समझनी पड़ती थीं, अब उन्हें केवल तीन बड़े हिस्सों में समेट दिया गया है—ज़रूरी जरूरतें, घर से जुड़ी जरूरतें और विशेष परिस्थितियां। मकसद साफ है कि आम कर्मचारी बिना उलझन के नियम समझ सके। लेकिन यही सरलता एक जोखिम भी बन सकती है, क्योंकि आसान पहुंच कई बार लोगों को बिना सोचे-समझे अपने रिटायरमेंट फंड को तोड़ने के लिए प्रेरित कर देती है।
असल में EPF किसी तात्कालिक खर्च का साधन नहीं, बल्कि रिटायरमेंट के बाद की आर्थिक सुरक्षा की नींव है। इसकी सबसे बड़ी ताकत लंबे समय तक चलने वाली कंपाउंडिंग है, जो समय के साथ छोटी रकम को भी बड़ा फंड बना देती है। इसलिए निकासी की सुविधा होते हुए भी इसे आखिरी विकल्प के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
पूरी EPF राशि निकालने की बात करें तो आमतौर पर 58 साल की उम्र पूरी होने के बाद, यानी रिटायरमेंट पर कर्मचारी को पूरा पीएफ निकालने का अधिकार होता है। इसके अलावा स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति, स्थायी दिव्यांगता या विदेश में स्थायी रूप से बसने जैसी परिस्थितियों में भी पूरी राशि निकाली जा सकती है। इन मामलों में EPF खाता स्वतः बंद माना जाता है।
बेरोज़गारी की स्थिति में भी EPF से मदद ली जा सकती है, लेकिन यहां निकासी को चरणों में बांटा गया है। नौकरी छूटने के बाद कर्मचारी तुरंत 75 प्रतिशत तक राशि निकाल सकता है। अगर 12 महीने तक नई नौकरी नहीं मिलती, तो शेष 25 प्रतिशत निकालने की अनुमति मिल जाती है। उद्देश्य यही है कि मुश्किल समय में सहारा मिले, लेकिन पूरी रिटायरमेंट पूंजी एक साथ खत्म न हो। कुछ विशेष हालात जैसे कंपनी का बंद हो जाना, श्रम कानूनों के तहत रिट्रेंचमेंट या EPF-कवर्ड संस्था में दोबारा नौकरी न करना—इन स्थितियों में भी पूरी निकासी संभव होती है।
रोज़मर्रा की ज़िंदगी की जरूरतों को देखते हुए EPFO ने आंशिक निकासी के नियम भी बनाए हैं। घर खरीदने या बनाने के लिए कम से कम 5 साल की सेवा के बाद पीएफ का 90 प्रतिशत तक निकाला जा सकता है। होम लोन चुकाने के लिए 10 साल और घर की मरम्मत के लिए 5 साल की सेवा जरूरी है, जबकि मरम्मत के लिए जीवन में सिर्फ दो बार निकासी की अनुमति होती है। मेडिकल इमरजेंसी में सबसे ज्यादा राहत दी गई है, जहां किसी न्यूनतम सेवा अवधि की शर्त नहीं है। खुद, जीवनसाथी, माता-पिता या बच्चों के इलाज के लिए छह महीने की सैलरी या अपने योगदान तक की राशि निकाली जा सकती है। शादी और पढ़ाई के लिए 7 साल की सेवा के बाद अपने योगदान का 50 प्रतिशत तक निकाला जा सकता है। वहीं 54 साल की उम्र के बाद या रिटायरमेंट से एक साल पहले, 90 प्रतिशत तक प्री-रिटायरमेंट निकासी भी संभव है।
EPF निकासी में सबसे ज्यादा चूक टैक्स को लेकर होती है। यहां सबसे अहम नियम है 5 साल की निरंतर सेवा। अगर आपने 5 साल पूरे कर लिए हैं, तो अधिकतर मामलों में EPF निकासी पूरी तरह टैक्स-फ्री होती है। लेकिन 5 साल से पहले निकासी करने पर 30 हजार रुपये से अधिक की राशि पर TDS कटता है। पैन कार्ड होने पर 10 प्रतिशत TDS लगता है, जबकि पैन न होने पर यह दर ज्यादा हो जाती है। अगर आपकी कुल आय टैक्स स्लैब में नहीं आती, तो Form 15G या 15H जमा करके TDS से बचा जा सकता है। हालांकि असली नुकसान टैक्स से ज्यादा कंपाउंडिंग के टूटने का होता है, क्योंकि EPF अभी 8 प्रतिशत से अधिक का रिटर्न दे रहा है और जल्दी निकासी इस लंबे फायदे को तोड़ देती है।
2025 में किए गए बदलावों ने EPF को जरूर ज्यादा मानवीय और लचीला बनाया है, लेकिन यह मुफ्त पैसा नहीं है। हर निकासी आज की परेशानी तो सुलझाती है, पर कल की सुरक्षा से उधार लेती है। इसलिए EPF को शॉर्टकट नहीं, बल्कि संकट के समय सहारा समझकर ही इस्तेमाल करना सबसे सही रणनीति है।