आयकर छूट का दायरा लगातार बढ़ने के बावजूद भारत में करदाताओं की संख्या जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है, वह टैक्स सिस्टम में बढ़ते भरोसे की साफ तस्वीर पेश करती है। संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक 2020-21 से 2024-25 के बीच जीरो टैक्स रिटर्न फाइल करने वालों की संख्या में करीब 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इससे कहीं ज्यादा अहम बात यह है कि इसी अवधि में वास्तविक रूप से टैक्स चुकाने वालों की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ गई है। यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि सोच और सिस्टम—दोनों में आए बड़े परिवर्तन को दिखाता है।
वित्त वर्ष 2020-21 में देश में कुल 6.72 करोड़ इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल किए गए थे। इनमें से 4.84 करोड़ लोग ऐसे थे, जिन पर कोई टैक्स देनदारी नहीं बनती थी, जबकि 1.88 करोड़ करदाताओं ने टैक्स चुकाया था। इसके मुकाबले 2024-25 में कुल रिटर्न फाइल करने वालों का आधार और मजबूत हुआ। जीरो टैक्स फाइलर बढ़कर 5.58 करोड़ तक पहुंच गए, लेकिन टैक्स देने वालों की संख्या भी तेज़ी से बढ़ते हुए 2.82 करोड़ हो गई। यानी अब ज्यादा लोग न सिर्फ सिस्टम में आ रहे हैं, बल्कि टैक्स देना भी स्वीकार कर रहे हैं।
अगर हिस्सेदारी की बात करें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। 2020-21 में कुल रिटर्न का 72 प्रतिशत हिस्सा जीरो टैक्स फाइलर्स का था, जो 2024-25 में घटकर 66 प्रतिशत रह गया। वहीं टैक्स देने वालों की भागीदारी 28 प्रतिशत से बढ़कर 34 प्रतिशत हो गई। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि आय घोषित करने और टैक्स चुकाने की प्रवृत्ति मजबूत हो रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बदलाव के पीछे टेक्नोलॉजी और सुधारों की बड़ी भूमिका है। AI आधारित सिस्टम, फेसलेस असेसमेंट और आयकर कानूनों की सरल प्रक्रियाओं ने करदाताओं के मन से डर और झिझक को काफी हद तक खत्म किया है। पहले जहां टैक्स बचाने की जटिल योजनाओं में लोग उलझे रहते थे, अब वे सीधे और पारदर्शी तरीके से टैक्स चुकाना बेहतर समझ रहे हैं। Income Tax Department द्वारा लागू किए गए सुधारों ने टैक्स सिस्टम को ज्यादा भरोसेमंद बनाया है।
कोविड के बाद वेतनभोगी वर्ग, व्यापार और MSME सेक्टर में आय बढ़ने का असर भी टैक्स कलेक्शन में साफ दिख रहा है। पिछले पांच वर्षों में कॉरपोरेट मुनाफे में हुई बढ़ोतरी ने भी टैक्स आधार को मजबूत किया है। नतीजा यह है कि ज्यादा लोग आयकर रिटर्न भरने लगे हैं और टैक्स चुकाने वालों की संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा है।
राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो दक्षिण भारत में जीरो टैक्स फाइलर्स की संख्या अपेक्षाकृत तेज़ी से बढ़ी है। तेलंगाना जैसे नए राज्य में पांच साल में जीरो फाइलर्स की संख्या तीन गुना हो गई, जबकि केरल में यह ढाई गुना और तमिलनाडु में करीब सवा गुना बढ़ी है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन राज्यों में बड़ी संख्या में युवा पहली नौकरी शुरू करते हैं। शुरुआती वेतन कम होने के बावजूद पैन, बैंक अकाउंट और पीएफ जैसी औपचारिकताएं पूरी हो जाती हैं, जिससे वे टैक्स छूट का लाभ लेते हुए जीरो रिटर्न फाइल करते हैं।
उत्तर भारत की बात करें तो यहां टैक्स देने वालों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिली है। हरियाणा इस मामले में शीर्ष पर है, उसके बाद गुजरात और बिहार का नंबर आता है। मध्य प्रदेश इस सूची में सातवें स्थान पर है। विशेषज्ञों के मुताबिक टैक्स छूट का दायरा बढ़ने से लोगों को यह भरोसा मिला है कि आय घोषित करने से भविष्य में आयकर से जुड़ी परेशानियों से बचा जा सकता है। यही वजह है कि बीते पांच वर्षों में करीब एक करोड़ नए करदाता सिस्टम में जुड़े हैं।
कुल मिलाकर ये आंकड़े बताते हैं कि भारत का टैक्स कल्चर बदल रहा है। छूट के बावजूद टैक्स देना अब बोझ नहीं, बल्कि एक सामान्य और स्वीकार्य प्रक्रिया बनता जा रहा है—और यही किसी भी मजबूत अर्थव्यवस्था की असली पहचान होती है।