अमेरिकी राजनीति और वैश्विक व्यापार के मोर्चे पर एक बार फिर भूचाल आने के संकेत हैं। वेनेजुएला के बाद अब अमेरिका की नजर सीधे भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे उभरते आर्थिक शक्तिकेंद्रों पर टिक गई है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump ने एक ऐसे कड़े और विवादास्पद द्विदलीय विधेयक को समर्थन दे दिया है, जिसके लागू होते ही रूस से तेल और यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक का भारी-भरकम टैरिफ लगाया जा सकता है। यह विधेयक अगले ही सप्ताह अमेरिकी संसद में मतदान के लिए पेश होने जा रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचैनी साफ दिखाई देने लगी है।
इस प्रस्तावित कानून के पीछे रिपब्लिकन सीनेटर Lindsey Graham की अहम भूमिका मानी जा रही है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर खुलासा किया कि ट्रंप के साथ हुई उनकी बैठक बेहद सकारात्मक रही और उसी के बाद इस बिल को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ। ग्राहम के मुताबिक, इस कानून का सीधा मकसद उन देशों पर आर्थिक दबाव बनाना है, जो रूस से सस्ता तेल खरीदकर यूक्रेन युद्ध में राष्ट्रपति Vladimir Putin की अर्थव्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से सहारा दे रहे हैं। अमेरिकी नजरिए से यह केवल व्यापार नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।
इस विधेयक को डेमोक्रेटिक सीनेटर Richard Blumenthal के साथ मिलकर पेश किया गया है, जिससे यह साफ हो जाता है कि रूस के खिलाफ सख्ती को लेकर अमेरिका में पार्टी लाइन से ऊपर उठकर सहमति बन रही है। यदि यह कानून पास होता है, तो अमेरिका के हाथ में भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे देशों पर अभूतपूर्व आर्थिक दबाव बनाने का औजार आ जाएगा। ग्राहम का दावा है कि यूक्रेन शांति वार्ता के लिए कई स्तरों पर रियायतें दे रहा है, लेकिन रूस की ओर से हिंसा और आक्रामकता में कोई कमी नहीं आई है, ऐसे में यह कानून “अनिवार्य” हो गया है।
भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि अमेरिका पहले ही संकेत दे चुका है कि नई दिल्ली पर अतिरिक्त टैरिफ लगाए जा सकते हैं। बीते साल ट्रंप ने भारतीय आयात पर 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ और रूस से तेल खरीदने पर अलग से 25 प्रतिशत पेनल्टी लगाने का ऐलान किया था। नतीजा यह हुआ कि कुछ भारतीय उत्पादों पर कुल शुल्क 50 प्रतिशत तक पहुंच गया, जिससे भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में खटास आ गई और कूटनीतिक स्तर पर असहजता बढ़ी।
चीन के साथ अमेरिका के रिश्ते तो पहले से ही टैरिफ वॉर की आग में झुलस रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन ने चीनी उत्पादों पर 145 प्रतिशत तक शुल्क लगाया था, जिसके जवाब में बीजिंग ने भी अमेरिकी सामानों पर 125 प्रतिशत टैरिफ ठोक दिया। अब अगर रूस से तेल खरीदने को आधार बनाकर 500 प्रतिशत तक का नया टैरिफ लागू हुआ, तो यह टकराव सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन और ऊर्जा बाजार पर भी गहरा असर डालेगा।
इसी बीच, एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप का बयान भी काफी चर्चा में रहा। उन्होंने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi जानते थे कि मैं इस स्थिति से खुश नहीं हूं। ट्रंप ने मोदी को “अच्छा इंसान” बताते हुए उनकी व्यक्तिगत प्रशंसा तो की, लेकिन साथ ही यह भी साफ कर दिया कि भारत पर टैरिफ बढ़ाना अमेरिका के लिए कोई मुश्किल फैसला नहीं होगा। यह बयान अपने आप में एक कूटनीतिक संदेश माना जा रहा है।
तनाव यहीं खत्म नहीं होता। अमेरिका ने हाल ही में भारतीय चावल के निर्यात पर भी आपत्ति जता दी है। व्हाइट हाउस में हुई एक बैठक के दौरान अमेरिकी किसानों ने भारत, चीन और थाईलैंड पर डंपिंग के आरोप लगाए, जिसके बाद ट्रंप ने नए टैरिफ की चेतावनी दे डाली। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले समय में कृषि व्यापार भी विवाद का बड़ा मोर्चा बन सकता है।
फिलहाल भारत और अमेरिका के बीच व्यापार विवाद सुलझाने की कोशिशें ठहराव का शिकार हैं। वॉशिंगटन चाहता है कि भारत कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क में कटौती करे, जबकि नई दिल्ली अपने किसानों और डेयरी सेक्टर की सुरक्षा को लेकर किसी भी तरह के समझौते से पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रही। ऐसे में आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि भारत-अमेरिका व्यापार संबंध सहयोग की नई राह पर आगे बढ़ते हैं या फिर टैरिफ की इस जंग में और गहराई तक फंसते चले जाते हैं।