नक्सली कमांडर देवा का बड़ा दावा: सरेंडर नहीं, गिरफ्तारी के बाद रची गई कहानी; हिड़मा को भी बताया फर्जी मुठभेड़ का शिकार

Spread the love

जगदलपुर से आई इस खबर ने नक्सल विरोधी अभियानों और हालिया समर्पण दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नक्सल संगठन की बटालियन के कमांडर बारसे देवा ने खुद अपने कथित समर्पण की कहानी को झूठा करार दिया है। हैदराबाद में पत्रकारों से बातचीत में देवा ने साफ कहा कि उसने कभी स्वेच्छा से सरेंडर नहीं किया, बल्कि छत्तीसगढ़–तेलंगाना सीमा पार करते वक्त उसे गिरफ्तार किया गया और बाद में दबाव में समर्पण दिखाया गया।

देवा के मुताबिक 29 दिसंबर को वह बोलेरो वाहन से अपने साथियों के साथ किसी संगठनात्मक काम से तेलंगाना जा रहा था। उसी दौरान तेलंगाना पुलिस ने उसे पकड़ लिया। इसके बाद चार दिन तक उससे पूछताछ की गई और फिर 3 जनवरी को हैदराबाद ले जाकर औपचारिक रूप से सरेंडर दिखा दिया गया। उसने दो टूक कहा कि जंगल छोड़कर वह समर्पण करने नहीं निकला था, बल्कि धोखे से फंसाया गया।

गौरतलब है कि 3 जनवरी को हैदराबाद में तेलंगाना के डीजीपी Shivadhar Reddy के सामने बारसे देवा ने अपने 19 साथियों के साथ आत्मसमर्पण किया था। उस वक्त इसे नक्सल संगठन के लिए बड़ा झटका बताया गया था। लेकिन अब उसी मंच से देवा का यह कहना कि समर्पण की पूरी पटकथा गढ़ी गई थी, मामले को और पेचीदा बना देता है।

हथियारों को लेकर भी देवा ने पुलिस के दावों को खारिज किया। उसने कहा कि नक्सलियों को विदेशों से कोई हथियार सप्लाई नहीं होती। समर्पण के दौरान दिखाए गए इजरायली तावोर और अमेरिकी कॉल्ट एम-4 जैसे हथियार दरअसल सुरक्षाबलों से लूटे गए थे। उसके अनुसार ये हथियार अलग-अलग हमलों के दौरान फोर्स से छीने गए थे, न कि किसी विदेशी नेटवर्क से मिले।

देवा ने यह भी कहा कि वह अपने साथियों के लिए कोई संदेश नहीं देना चाहता। जो आना चाहे, वह अपनी मर्जी से फैसला ले। बटालियन में भर्ती को लेकर उसने दावा किया कि 15 साल से ऊपर के लड़कों को ही संगठन में लिया जाता था और किसी पर जबरदस्ती नहीं की जाती थी। उसने खुद को जनता की समस्याओं और नक्सल विचारधारा से प्रभावित बताकर संगठन में शामिल होने की बात कही।

सबसे सनसनीखेज बयान हिड़मा को लेकर सामने आया। देवा ने कहा कि हिड़मा को पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में मारा है। उसने मनीष कुंजाम के उस आरोप को भी गलत बताया, जिसमें कहा गया था कि हिड़मा को देवा ने मरवाया। देवा के मुताबिक 27 अक्टूबर तक वह हिड़मा के संपर्क में था। अप्रैल में वे करेंगुट्टा इलाके में साथ थे और उन्होंने सोचा था कि पुलिस का ऑपरेशन एक-दो दिन चलेगा, लेकिन इतना बड़ा अभियान चलेगा, इसका अंदाज़ा नहीं था।

देवा ने बताया कि सुबह करीब साढ़े छह बजे ऑपरेशन शुरू हुआ। उस वक्त वह करेंगुट्टा की पहाड़ी पर मौजूद था। हालात बिगड़ते देख उसने संगठन के बड़े नेताओं को अलग-अलग इलाकों में निकलवा दिया। उसके अनुसार उस समय तक पहाड़ी पर उनके किसी भी साथी की मौत नहीं हुई थी, लेकिन बाद में पुलिस ने 36 नक्सलियों को पकड़कर मार दिया।

बारसे देवा के इन बयानों ने नक्सल इलाकों में चल रहे अभियानों, सरेंडर नीति और मुठभेड़ों की सच्चाई को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक नक्सली का बचाव बयान है या फिर इसके पीछे कोई बड़ी और असहज सच्चाई छिपी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *