सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: कुत्ते इंसानी डर पहचानते हैं, इसलिए हमला करते हैं—देश में शेल्टर नहीं, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी सबसे बड़ी चुनौती

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आवारा कुत्तों के बढ़ते खतरे और प्रबंधन को लेकर Supreme Court of India में लगातार दूसरे दिन लंबी और तीखी सुनवाई हुई। करीब ढाई घंटे चली बहस के दौरान अदालत में न सिर्फ कानूनी पहलुओं पर, बल्कि कुत्तों के व्यवहार, इंसानी सुरक्षा और सरकारी व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर भी खुलकर चर्चा हुई। सुनवाई के दौरान जस्टिस Vikram Nath ने एक अहम और चौंकाने वाली टिप्पणी करते हुए कहा कि कुत्ते इंसानों के डर को पहचान लेते हैं और अक्सर इसी वजह से हमला करते हैं। जब एक वकील ने इस बात से असहमति जताई, तो जस्टिस ने साफ कहा कि यह बात वे अपने निजी अनुभव के आधार पर कह रहे हैं।

कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से यह बड़ा सवाल उठाया गया कि राज्यों द्वारा पेश किए गए हलफनामों में कहीं भी यह साफ नहीं किया गया कि नगरपालिकाओं के पास कितने शेल्टर होम हैं। वकील ने अदालत को बताया कि पूरे देश में सिर्फ पांच सरकारी शेल्टर हैं और वे भी मुख्य रूप से बीमार या घायल कुत्तों के लिए हैं। हर शेल्टर की क्षमता महज 100 कुत्तों की है। ऐसे में अदालत के निर्देशों को लागू करने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा ही मौजूद नहीं है। वकील ने साफ कहा कि समस्या का मूल समाधान इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में है, न कि सिर्फ आदेश जारी करने में।

सुनवाई के दौरान एनिमल वेलफेयर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता C. U. Singh ने कुत्तों को हटाने या शेल्टर भेजने पर आपत्ति जताई। उन्होंने दलील दी कि अगर कुत्तों को बड़े पैमाने पर हटाया गया, तो चूहों की आबादी तेजी से बढ़ेगी और वे ज्यादा खतरनाक बीमारियां फैलाएंगे। इस पर जस्टिस Sandeep Mehta ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि फिर तो बिल्लियों को बढ़ावा देना पड़ेगा। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि अदालत ने कभी यह नहीं कहा कि हर कुत्ते को सड़क से हटा दिया जाए, बल्कि नियमों के अनुसार मानवीय व्यवहार जरूरी है।

सुनवाई में यह भी सामने आया कि कुत्तों की सही मॉनिटरिंग के लिए पहले उनकी गिनती जरूरी है, जो आखिरी बार 2009 में हुई थी। उस समय सिर्फ दिल्ली में ही करीब 5.6 लाख आवारा कुत्ते बताए गए थे। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब शेल्टर की क्षमता ही नहीं है, तो बड़ी संख्या में कुत्तों को पकड़कर आखिर रखा कहां जाएगा। संक्रमित और स्वस्थ कुत्तों को एक साथ रखने से नई समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

एक अन्य सुझाव के रूप में माइक्रो-चिपिंग पर भी चर्चा हुई। अदालत को बताया गया कि बेंगलुरु जैसे शहरों में कुत्तों की माइक्रो-चिपिंग शुरू हो चुकी है, जिससे उनकी पहचान, वैक्सीनेशन और नसबंदी का रिकॉर्ड रखा जा सकता है। इससे अव्यवस्था कम करने में मदद मिल सकती है।

कोर्ट ने यह भी दोहराया कि पहले ही स्कूलों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों और अन्य सार्वजनिक संस्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए जा चुके हैं। साथ ही कहा गया था कि उन्हें तय शेल्टर में ट्रांसफर किया जाए। लेकिन मौजूदा हालात में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने बड़े पैमाने पर शेल्टर और संसाधन आखिर कहां हैं।

दिन के अंत में अदालत ने संकेत दिया कि समस्या का समाधान सिर्फ भावनाओं या एकतरफा दलीलों से नहीं होगा। इंसानों की सुरक्षा, पशु कल्याण और सरकारी क्षमता—तीनों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। अगली सुनवाई में अदालत इस मुद्दे पर और गहराई से चर्चा करेगी, जहां इंफ्रास्ट्रक्चर, फंडिंग और व्यावहारिक मॉडल पर ठोस दिशा तय होने की उम्मीद है।

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