दिल्ली स्कूल ट्रिब्यूनल के आदेशों पर सख्ती: हाईकोर्ट ने एलजी को दिए नियम बनाने के निर्देश, तीन महीने की डेडलाइन तय

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दिल्ली में स्कूल ट्रिब्यूनल के आदेशों को लेकर लंबे समय से चली आ रही ढिलाई पर अब न्यायपालिका ने कड़ा रुख अपना लिया है। Delhi High Court ने साफ शब्दों में कहा है कि दिल्ली स्कूल ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेश तब तक प्रभावी नहीं माने जा सकते, जब तक उनके क्रियान्वयन के लिए ठोस और कानूनी ढांचा मौजूद न हो। इसी को लेकर अदालत ने दिल्ली के उपराज्यपाल Vinai Saxena को निर्देश दिया है कि वे नियम बनाकर या किसी अन्य वैधानिक उपाय के जरिए अधिकतम तीन महीने के भीतर एक प्रभावी प्रवर्तन तंत्र विकसित करें।

मुख्य न्यायाधीश D K Upadhyaya और न्यायमूर्ति Tejas Karia की पीठ ने इस बात पर नाराज़गी जताई कि अदालत के पुराने निर्देशों के बावजूद सरकार ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया। कोर्ट ने याद दिलाया कि हाईकोर्ट की फुल बेंच ने वर्ष 2010 में ही ट्रिब्यूनल के आदेशों को लागू कराने के लिए नियम बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन करीब डेढ़ दशक बीत जाने के बाद भी यह मसला जस का तस बना हुआ है।

अदालत ने दो टूक कहा कि बिना अधिकार दिए किसी भी ट्रिब्यूनल से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि उसके आदेश जमीन पर लागू होंगे। कोर्ट ने सवाल उठाया कि आखिर ट्रिब्यूनल को सशक्त बनाने में बाधा क्या है। न्यायपीठ ने स्पष्ट किया कि नियमों में संशोधन करके या कानून के तहत संभव किसी भी तंत्र के माध्यम से स्कूल ट्रिब्यूनल को मजबूत करना सरकार की जिम्मेदारी है।

यह मामला एनजीओ Justice For All द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिका में तर्क दिया गया था कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में निजी स्कूलों के कर्मचारियों के पास ट्रिब्यूनल के आदेशों को लागू कराने का कोई प्रभावी माध्यम नहीं है, जिससे उन्हें वर्षों तक न्याय का इंतजार करना पड़ता है।

वहीं दिल्ली सरकार की ओर से दलील दी गई कि याचिका कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। सरकार ने कहा कि 1973 के अधिनियम की धाराओं के तहत गैर-अनुपालन की स्थिति में स्कूल प्रबंधन के अधिग्रहण और प्रबंधकों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान पहले से मौजूद है। इसके अलावा न्यायाधिकरण नियमित रूप से निष्पादन अपीलों की सुनवाई कर सकता है।

इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि जब तक कानून में स्पष्ट प्रावधान और नियम नहीं होंगे, तब तक केवल परंपरा या पुराने अभ्यास के भरोसे आदेशों का पालन नहीं कराया जा सकता। अंततः अदालत ने तीन महीने के भीतर दिल्ली स्कूल ट्रिब्यूनल के आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए नियम बनाने का निर्देश देते हुए याचिका का निपटारा कर दिया।

यह फैसला न सिर्फ ट्रिब्यूनल की ताकत बढ़ाने की दिशा में अहम माना जा रहा है, बल्कि इससे हजारों स्कूल कर्मचारियों को यह उम्मीद भी जगी है कि उनके पक्ष में आए आदेश अब कागजों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि जमीन पर भी लागू होते नजर आएंगे।

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