राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार फिर आत्मनिर्भरता और स्वदेशी सोच पर जोर देते हुए साफ कहा है कि भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार करेगा, लेकिन किसी भी देश के दबाव में आकर अपने फैसले नहीं बदलेगा। महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में आयोजित एक हिंदू सम्मेलन में उन्होंने लोगों से अपील की कि जहां तक संभव हो, देश में बना हुआ सामान ही खरीदा जाए और विदेश से वही चीज मंगाई जाए, जो भारत में बन ही नहीं सकती।
भागवत ने कहा कि चाहे कोई देश टैरिफ लगाए या आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश करे, भारत ने आत्मनिर्भर बनने का रास्ता चुन लिया है और अब उसी दिशा में आगे बढ़ना होगा। उन्होंने ग्लोबलाइजेशन की भारतीय सोच को स्पष्ट करते हुए कहा कि कुछ देश इसे केवल ग्लोबल मार्केट के रूप में देखते हैं, जबकि भारत इसे एक वैश्विक परिवार के नजरिए से देखता है। भारत का उद्देश्य दूसरे देशों में रोजगार पैदा करना नहीं है, यह उनकी जिम्मेदारी है। भारत को अपने लोगों, अपने समाज और अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह एक विचार, संस्कृति और चरित्र का नाम है। भारत के साथ अगर कुछ अच्छा या बुरा होता है, तो उसके लिए सवाल हिंदू समाज से ही किए जाएंगे। उन्होंने याद दिलाया कि सदियों के हमलों, कठिन परिस्थितियों और विनाश के बावजूद भारत की परंपराएं और मूल मूल्य जीवित रहे। जिन लोगों ने अपने भीतर संस्कार, धर्म और नैतिकता को संभालकर रखा, वही हिंदू कहलाए और उसी भूमि को भारत कहा गया।
भागवत ने जोर देकर कहा कि अगर भारत के नागरिक ईमानदार, अच्छे और मजबूत चरित्र वाले बनते हैं, तो वही गुण पूरी दुनिया में भारत की पहचान बनेंगे। आज दुनिया भारत से उम्मीद कर रही है और भारत तभी सही मायनों में वैश्विक भूमिका निभा पाएगा, जब वह शक्तिशाली और प्रभावशाली होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि ताकत का मतलब केवल हथियार नहीं होता, बल्कि समझ, नैतिकता, ज्ञान और सही सिद्धांत भी ताकत का ही रूप हैं।
उन्होंने हिंदू समाज की एकता को केवल संघ का लक्ष्य नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी बताया। संघ पहल कर सकता है, लेकिन असली बदलाव समाज को मिलकर लाना होगा। अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्वक और चरणबद्ध तरीके से संघर्ष करने की बात करते हुए उन्होंने भगवान राम का उदाहरण दिया, जिन्होंने पहले संवाद से समाधान की कोशिश की और जब आवश्यकता पड़ी, तब युद्ध का मार्ग अपनाया। उन्होंने रोजमर्रा के जीवन में भी जिम्मेदार नागरिक बनने की अपील की, जैसे समय पर बिल भरना, ट्रैफिक नियमों का पालन करना और व्यवहार में ईमानदारी रखना।
भागवत ने कहा कि आध्यात्मिकता और सनातन धर्म भारत की सबसे बड़ी ताकत रहे हैं, इसी कारण भारत की सभ्यता आज तक जीवित है, जबकि दुनिया की कई प्राचीन सभ्यताएं समाप्त हो चुकी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया ताकत की भाषा समझती है, लेकिन सच्ची ताकत वही होती है जो बुद्धि, चरित्र, ज्ञान और सही रणनीति पर आधारित हो। अगर हिंदू समाज मजबूत होगा, तो देश भी मजबूत बनेगा और तभी भारत दुनिया की सेवा कर पाएगा।
अपने संदेश के अंत में उन्होंने समाज से जाति, संप्रदाय, भाषा और पेशे की दीवारें तोड़कर बराबरी और भाईचारे की भावना अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने परिवारों से भी आग्रह किया कि हफ्ते में कम से कम एक बार सभी सदस्य साथ बैठें, साथ भोजन करें, भजन करें और अपने पूर्वजों की उपलब्धियों, परंपराओं और जीवन मूल्यों पर चर्चा करें। विदेश यात्रा को जरूरी बताते हुए उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों, जैसे महाराणा प्रताप के किलों, को भी जरूर देखना चाहिए, ताकि अपनी जड़ों से जुड़ाव बना रहे।