रसोई में हल्दी केवल स्वाद या रंग के लिए नहीं, बल्कि सेहत की पहली ढाल मानी जाती है। चोट पर हल्दी लगाना हो या सर्दी-जुकाम में हल्दी वाला दूध, हर घर में इसका भरोसा पुराना है। लेकिन बाजार में बढ़ती मिलावट ने इस भरोसेमंद मसाले को भी संदिग्ध बना दिया है। सस्ती हल्दी में रंग चटकाने और वजन बढ़ाने के लिए केमिकल डाई, स्टार्च और यहां तक कि मिट्टी तक मिलाई जा रही है, जो धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचा सकती है। ऐसे में जरूरी है कि हल्दी खरीदने के बाद उसकी शुद्धता खुद ही परख ली जाए।
हल्दी की मिलावट पहचानना कोई मुश्किल काम नहीं है। एक गिलास साफ पानी में आधा चम्मच हल्दी डालकर बिना हिलाए छोड़ दें। अगर हल्दी असली होगी तो वह नीचे बैठ जाएगी और पानी लगभग साफ रहेगा। पानी का तेजी से पीला या मटमैला हो जाना इस बात का संकेत है कि उसमें रंग या केमिकल मिलाया गया है। इसी तरह, प्लेट में थोड़ी हल्दी लेकर उस पर नींबू का रस या सिरका डालें। अगर रंग में झाग बने या हल्दी लाल-भूरी होने लगे, तो समझ लें कि इसमें केमिकल डाई मौजूद है। शुद्ध हल्दी इस तरह की प्रतिक्रिया नहीं दिखाती।
हथेली पर रगड़कर भी हल्दी की सच्चाई सामने आ जाती है। चुटकी भर हल्दी लेकर हल्के हाथ से रगड़ें। अगर रंग जरूरत से ज्यादा तेज निकलता है और हाथ धोने के बाद भी नहीं जाता, तो यह सिंथेटिक कलर की निशानी हो सकती है। असली हल्दी हल्का रंग छोड़ती है और आसानी से साफ हो जाती है। वहीं गर्म पानी में हल्दी डालने पर अगर पानी गाढ़ा हो जाए, तो यह स्टार्च की मिलावट का इशारा है। शुद्ध हल्दी पानी में घुलकर नीचे बैठती है, लेकिन पानी की बनावट नहीं बदलती।
अगर संभव हो, तो कच्ची हल्दी की गांठ खरीदकर घर पर उसका पाउडर बनाएं और बाजार की हल्दी से तुलना करें। शुद्ध हल्दी की खुशबू तेज, मिट्टी जैसी और स्वाद हल्का कड़वा होता है, जबकि मिलावटी हल्दी में यह प्राकृतिक सुगंध अक्सर गायब रहती है। यही अंतर आपको सही और गलत हल्दी में फर्क करना सिखा देता है।
मिलावटी हल्दी का लगातार सेवन लिवर, पेट और त्वचा से जुड़ी समस्याएं बढ़ा सकता है। लंबे समय में यह इम्युनिटी कमजोर करने के साथ गंभीर बीमारियों की वजह भी बन सकती है। इसलिए हल्दी खरीदते वक्त ज्यादा चमकदार रंग से बचें, भरोसेमंद ब्रांड या स्थानीय किसान की हल्दी चुनें और जहां तक हो सके साबुत हल्दी लेकर घर पर ही पीसें। थोड़ी सी सावधानी आपकी सेहत को बड़े नुकसान से बचा सकती है।