देश की चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा NEET PG का कट-ऑफ घटाकर ‘माइनस 40’ किए जाने के फैसले ने चिकित्सा जगत में तीखी बहस छेड़ दी है। इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ सिविल सोसाइटी ने इसे योग्यता के साथ खुला समझौता बताते हुए द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर NMC को तत्काल भंग करने की मांग उठाई है।
सोसाइटी के संयोजक डॉ. कुलदीप सोलंकी ने इस फैसले को मेडिकल शिक्षा के इतिहास का “काला अध्याय” करार देते हुए कहा कि कट-ऑफ को शून्य से भी नीचे ले जाना न केवल मेरिट का अपमान है, बल्कि इससे भविष्य में ऐसे विशेषज्ञ तैयार होंगे जिनके हाथों आम जनता की जान जोखिम में पड़ सकती है। उनका कहना है कि NMC की स्थापना चिकित्सा शिक्षा के मानकों को ऊंचा उठाने के लिए हुई थी, लेकिन हालिया निर्णयों ने उसकी मूल भावना पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
राष्ट्रपति को भेजी गई याचिका में आरोप लगाया गया है कि आयोग गुणवत्ता सुधारने के बजाय निजी मेडिकल कॉलेजों की सीटें भरने को प्राथमिकता दे रहा है। सोसाइटी ने केंद्र सरकार से NMC अधिनियम 2019 की धारा 55 के तहत आयोग को भंग करने, अंतरिम तौर पर प्रख्यात शिक्षाविदों और ईमानदार स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की नियुक्ति करने और मेरिट आधारित व्यवस्था बहाल करने की मांग की है। पत्र में यह भी चेतावनी दी गई है कि गलत नीतियों के चलते मेधावी छात्र विदेशों का रुख कर रहे हैं, जिससे देश को ‘ब्रेन ड्रेन’ का भारी नुकसान हो रहा है।
सोसाइटी का कहना है कि बुनियादी ढांचे की कमी, फैकल्टी शॉर्टेज और गुणवत्ता नियंत्रण जैसे मूल मुद्दों पर NMC पूरी तरह विफल रहा है, जबकि ऐसे समय में कट-ऑफ घटाने जैसे फैसले पूरे सिस्टम की साख को कमजोर करते हैं। अब चिकित्सा समुदाय की निगाहें केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं—क्या इस विरोध के बाद व्यवस्था में सुधार होगा या विवाद और गहराएगा।