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रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर, डॉलर के मुकाबले 91.56 तक फिसला, बढ़ती वैश्विक बेचैनी बनी वजह

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भारतीय मुद्रा के इतिहास में एक और नकारात्मक अध्याय जुड़ गया है। बुधवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 91.56 के स्तर तक टूट गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। इससे पहले रुपया 91.50 तक फिसल चुका था, लेकिन अब वह उस स्तर को भी पार कर गया है। विदेशी मुद्रा बाजार में यह गिरावट ऐसे समय पर देखने को मिली है, जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता का माहौल है और निवेशक जोखिम से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं।

आंकड़ों पर नजर डालें तो जनवरी महीने में ही रुपया करीब 1.5 प्रतिशत कमजोर हो चुका है। वहीं पूरे साल 2025 की बात करें तो अब तक रुपये में लगभग 5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। लगातार नए निचले स्तर बनना इस बात का संकेत है कि बाजार पर दबाव लगातार बढ़ रहा है और फिलहाल रुपये को मजबूत करने वाले कारक कमजोर पड़ते दिख रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये पर बढ़ते दबाव की सबसे बड़ी वजह वैश्विक स्तर पर ‘रिस्क अवॉयडेंस’ यानी जोखिम से बचाव की प्रवृत्ति है। अंतरराष्ट्रीय निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर सुरक्षित ठिकानों की ओर बढ़ रहे हैं और इसमें अमेरिकी डॉलर सबसे बड़ा विकल्प बनकर सामने आया है। डॉलर की मजबूत होती स्थिति का सीधा असर रुपये जैसी मुद्राओं पर पड़ रहा है।

इसके साथ ही घरेलू बाजार में भी डॉलर की मांग बढ़ गई है। आयातक कंपनियां आने वाले दिनों में और गिरावट की आशंका के चलते अग्रिम तौर पर डॉलर खरीद रही हैं, जबकि निर्यातक डॉलर बेचने में सतर्कता बरत रहे हैं। इस असंतुलन ने विदेशी मुद्रा बाजार में दबाव को और गहरा कर दिया है, जिससे रुपये की कमजोरी और तेज हो गई है।

बाजार जानकारों का मानना है कि भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति या चालू खाता घाटा फिलहाल बड़ी चिंता का कारण नहीं है। असली समस्या पूंजी प्रवाह यानी कैपिटल फ्लो में आई गिरावट है। विदेशी निवेश की रफ्तार धीमी पड़ने से रुपया ज्यादा संवेदनशील हो गया है और थोड़े से नकारात्मक संकेत पर भी तेजी से टूट रहा है।

जनवरी महीने में अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से करीब 3 अरब डॉलर की निकासी की जा चुकी है। वहीं पूरे 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 18.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। विदेशी निवेशकों की इस लगातार बिकवाली ने रुपये पर दबाव को और मजबूत कर दिया है और बाजार की धारणा को कमजोर किया है।

भारत और अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौते को लेकर भी अब तक कोई ठोस प्रगति सामने नहीं आई है, जिससे बाजार को कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिल पाया है। दूसरी ओर Reserve Bank of India जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है, ताकि तेज उतार-चढ़ाव को नियंत्रित किया जा सके। हालांकि, आरबीआई किसी तय स्तर को बचाने की नीति नहीं अपना रहा, बल्कि केवल अस्थिरता को सीमित रखने पर जोर दे रहा है।

कुल मिलाकर, वैश्विक अनिश्चितता, डॉलर की मजबूती, विदेशी पूंजी की निकासी और घरेलू स्तर पर बढ़ती डॉलर मांग ने मिलकर रुपये को ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंचा दिया है। आने वाले दिनों में रुपये की चाल काफी हद तक वैश्विक संकेतों और निवेशकों की धारणा पर निर्भर करती नजर आ रही है।

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