भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में एक ऐतिहासिक बदलाव की पटकथा लिखी जा रही है। बंगलूरू की स्पेस-टेक स्टार्टअप Pixxel के नेतृत्व में भारतीय स्टार्टअप्स का एक कंसोर्टियम देश का पहला निजी तौर पर विकसित नेशनल अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन लॉन्च करने जा रहा है। यह परियोजना न सिर्फ तकनीकी रूप से महत्वाकांक्षी है, बल्कि भारत की अंतरिक्ष नीति में एक बड़े वैचारिक बदलाव का संकेत भी देती है, जहां अब कमान धीरे-धीरे सरकारी संस्थानों से निकलकर निजी हाथों में जाती दिख रही है।
इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत कुल 12 अत्याधुनिक उपग्रहों का एक नेटवर्क तैयार किया जाएगा, जो पृथ्वी की हाई-क्वालिटी तस्वीरें और बहु-स्तरीय डेटा उपलब्ध कराएगा। इन उपग्रहों से मिलने वाला डेटा कृषि, पर्यावरण, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, समुद्री निगरानी और आपदा प्रबंधन जैसे अहम क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जाएगा। इस मिशन की औपचारिक शुरुआत बंगलूरू में IN-SPACe के साथ हुए एक अहम समझौते के जरिए हुई है, जिसने भारत के पहले स्वदेशी और व्यावसायिक अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट नेटवर्क का रास्ता खोल दिया है।
इस कंसोर्टियम में Pixxel के साथ PierSight, SatSure Analytics India और Dhruva Space जैसी उभरती हुई भारतीय स्पेस कंपनियां शामिल हैं। मिलकर ये कंपनियां 12 उपग्रहों का डिजाइन, निर्माण, लॉन्च और संचालन करेंगी। खास बात यह है कि यह पूरा नेटवर्क अत्याधुनिक इमेजिंग क्षमताओं से लैस होगा, जिसमें हाई-रेजोल्यूशन ऑप्टिकल इमेजिंग, मल्टीस्पेक्ट्रल, SAR यानी सिंथेटिक एपर्चर रडार और हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग शामिल होंगी। यानी यह सिस्टम सिर्फ तस्वीरें नहीं लेगा, बल्कि धरती के हर बदलाव को बेहद बारीकी से पढ़ सकेगा।
Pixxel के सीईओ अवैस अहमद के मुताबिक, यह 1,200 करोड़ रुपये से ज्यादा की राष्ट्रीय महत्व की परियोजना है। सरकार द्वारा इस प्रोजेक्ट को स्टार्टअप्स को सौंपना इस बात का संकेत है कि भारत का प्राइवेट स्पेस सेक्टर अब सिर्फ सपोर्टिंग रोल में नहीं, बल्कि लीडरशिप की भूमिका निभाने के लिए तैयार है। यह आत्मनिर्भर भारत के विज़न को अंतरिक्ष क्षेत्र में जमीन पर उतारने जैसा कदम माना जा रहा है।
लॉन्च टाइमलाइन की बात करें तो Pixxel का कहना है कि 2027 की पहली तिमाही में पहले चार उपग्रह कक्षा में स्थापित किए जाएंगे। इसके बाद बाकी उपग्रहों को चरणबद्ध तरीके से अगले कुछ वर्षों में लॉन्च किया जाएगा। एक बार पूरा नेटवर्क सक्रिय हो गया, तो भारत के पास एक ऐसा निजी लेकिन राष्ट्रीय महत्व का अर्थ ऑब्जर्वेशन सिस्टम होगा, जो वैश्विक स्तर पर भी प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम होगा।
इस प्रोजेक्ट का सबसे दिलचस्प पहलू इसका कॉन्ट्रैक्ट मॉडल है। अगस्त 2025 में इस कंसोर्टियम ने यह सरकारी प्रोजेक्ट ‘जीरो बिड’ पर हासिल किया था। यानी सरकार की ओर से प्रस्तावित 350 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता लेने से इन कंपनियों ने इनकार कर दिया और खुद के संसाधनों से डिजाइन, निर्माण और संचालन की जिम्मेदारी उठाने का भरोसा दिखाया। यह कदम भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम के आत्मविश्वास और परिपक्वता को दर्शाता है।
IN-SPACe के जरिए सरकारी एजेंसियों को इस नेटवर्क से भरोसेमंद और समय पर डेटा मिलेगा, वहीं निजी क्षेत्र के लिए भी नए बिजनेस मॉडल और अवसर खुलेंगे। Pixxel इस सिस्टम को सिर्फ निगरानी का टूल नहीं, बल्कि पृथ्वी का एक “हेल्थ मॉनिटर” बनाना चाहता है, जो किसी भी पर्यावरणीय या प्राकृतिक संकट से पहले संकेत दे सके।
कुल मिलाकर, यह परियोजना सिर्फ 12 उपग्रहों की कहानी नहीं है, बल्कि उस बदलाव की झलक है, जहां भारत अंतरिक्ष में एक मजबूत, आत्मनिर्भर और निजी नेतृत्व वाली स्पेस पावर बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। सवाल अब यह नहीं है कि क्या भारत स्पेस सुपरपावर बनेगा, बल्कि यह है कि वह कितनी जल्दी और कितनी मजबूती से यह मुकाम हासिल करेगा।