छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग और दवा निगम से जुड़े 660 करोड़ रुपये के महाघोटाले ने व्यवस्था की परतें उधेड़ दी हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक इस पूरे खेल में किसी बड़े अफसर पर आंच नहीं आई। जांच का सारा बोझ मातहत अधिकारियों पर डाल दिया गया है, जो बीते दस महीनों से जेल में बंद हैं। आरोप है कि अरबों रुपये की मशीनों और रीएजेंट की खरीदी में सुनियोजित साजिश रची गई, लेकिन फैसलों पर दस्तखत करने वाले शीर्ष अधिकारी आज भी सवालों के घेरे से बाहर नजर आ रहे हैं।
मरीजों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में बेहतर जांच सुविधा देने के नाम पर करोड़ों रुपये की मशीनें और उससे जुड़ा सामान खरीदा गया। जांच में खुलासा हुआ कि यह पूरा सौदा जरूरत से ज्यादा कीमतों पर किया गया। इस मामले में मोक्षित कार्पोरेशन के एमडी शशांक चोपड़ा को जनवरी में मास्टरमाइंड बताते हुए गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद मार्च में स्वास्थ्य संचालनालय से जुड़े एक डॉक्टर और दवा निगम के चार मैदानी अधिकारियों को हिरासत में लिया गया। तब से ये सभी आरोपी जेल में हैं, जबकि जिनकी सहमति के बिना इतनी बड़ी खरीदी संभव नहीं मानी जाती, वे जांच के बाद भी बाहर हैं।
गिरफ्तारियों के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि जांच की आंच उन वरिष्ठ अधिकारियों तक भी पहुंचेगी, जिनकी भूमिका पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। पूछताछ के दौरान तत्कालीन संचालक स्वास्थ्य सेवाएं और दवा निगम के शीर्ष अधिकारी भी जांच एजेंसी के सामने पेश हुए, लेकिन उन्होंने किसी भी तरह की जानकारी होने से इनकार कर दिया। पूछताछ पूरी होते ही इन्हें बख्श दिया गया और घोटाले की पूरी जिम्मेदारी गिरफ्तार अफसरों और सप्लायर कंपनियों पर डाल दी गई।
इस पूरे मामले की जांच Economic Offences Wing कर रही है। हाल ही में ईओडब्ल्यू ने मोक्षित कार्पोरेशन के साथ कार्टेल बनाकर काम करने वाली दो अन्य कंपनियों से जुड़े तीन लोगों को भी गिरफ्तार किया है। इसके बावजूद यह सवाल जस का तस बना हुआ है कि इतने बड़े आर्थिक अपराध में नीति निर्धारण करने वाले अफसरों की भूमिका आखिर कहां गई।
घोटाले के आंकड़े खुद कहानी बयां करते हैं। बाजार में महज 8.50 रुपये में मिलने वाली ईडीए ट्यूब को 2352 रुपये प्रति नग खरीदा गया। पांच लाख रुपये की सीबीसी मशीन को 25 लाख रुपये में दिखाया गया। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक भेजे गए कई रीएजेंट उपयोग से पहले ही खराब हो गए, जिससे करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ और मरीजों को कोई लाभ नहीं मिला।
मामला खुलने के बाद एक और गंभीर पहलू सामने आया। मोक्षित कार्पोरेशन के इंजीनियरों ने कई स्वास्थ्य केंद्रों में जाकर सप्लाई की गई सीबीसी मशीनों को कोड-लॉक कर दिया। इसके चलते ये मशीनें केवल उसी कंपनी के रीएजेंट पर निर्भर हो गईं। आज भी कई जगह यह ‘कोड का जाल’ बरकरार है। CGMSC अब नई एजेंसी से अनुबंध कर इस तकनीकी जाल को हटाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन तब तक मरीजों को साधारण जांच के लिए भी बड़े अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बड़े अफसर सिस्टम से ऊपर हैं और क्या जिम्मेदारी हमेशा नीचे तक ही सीमित रहेगी। 660 करोड़ के इस महाघोटाले में अब तक की कार्रवाई यही इशारा करती है कि कानून का डंडा मातहतों पर तो भारी है, लेकिन सत्ता और पद के ऊंचे गलियारों तक पहुंचते-पहुंचते कमजोर पड़ जाता है।