भारतीय जनता पार्टी की शीर्ष राजनीति में छत्तीसगढ़ का कद एक बार फिर साफ तौर पर उभरकर सामने आया है। पहले J. P. Nadda और अब छत्तीसगढ़ के प्रभारी रह चुके Nitin Nabin का पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना इस बात का संकेत है कि केंद्रीय नेतृत्व की राजनीति में राज्य की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है। यह बदलाव सिर्फ दिल्ली की सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी असर छत्तीसगढ़ की संगठनात्मक राजनीति और सियासी दिशा पर भी दिखाई दे सकते हैं।
भाजपा के इतिहास में यह दूसरा मौका है, जब छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी संभाल चुके नेता को पार्टी की कमान सौंपी गई है। जेपी नड्डा ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पहले छत्तीसगढ़ प्रभारी के तौर पर काम किया था और उनके कार्यकाल में राज्य को संगठनात्मक प्रयोगशाला की तरह देखा गया। अब नितिन नवीन के चयन को भी उसी निरंतरता में देखा जा रहा है, जहां छत्तीसगढ़ जैसे संघर्षशील राज्य में काम करने का अनुभव राष्ट्रीय स्तर पर रणनीति गढ़ने में मददगार माना जा रहा है।
नितिन नवीन का छत्तीसगढ़ कनेक्शन केवल औपचारिक नहीं रहा है। प्रभारी रहते हुए उन्होंने विधानसभा और फिर लोकसभा चुनावों की तैयारियों से लेकर टिकट वितरण, जिलों में संगठन को मजबूत करने और स्थानीय नेतृत्व के साथ तालमेल बैठाने तक अहम भूमिका निभाई। आदिवासी, ग्रामीण और शहरी वोट बैंक की अलग-अलग संवेदनशीलताओं को समझते हुए उन्होंने जमीनी राजनीति को करीब से देखा और उसकी रिपोर्ट सीधे केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाई। यही अनुभव अब राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनकी कार्यशैली को दिशा देने वाला माना जा रहा है।
छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ वर्षों में भाजपा को संगठनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कांग्रेस की सरकार, स्थानीय मुद्दों का दबाव और अंदरूनी गुटबाजी जैसी स्थितियों के बीच नितिन नवीन का जोर संगठन को नीचे तक सक्रिय रखने पर रहा। मंडल से लेकर जिला स्तर तक फीडबैक सिस्टम को मजबूत किया गया और यह साफ संदेश दिया गया कि संगठन और सरकार अलग-अलग दिशा में नहीं चल सकते। इसी सोच के चलते कई जगह संगठनात्मक फेरबदल भी देखने को मिले।
राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद छत्तीसगढ़ को इसका सीधा लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। सबसे बड़ा फायदा यह माना जा रहा है कि अब राज्य के मुद्दे सीधे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक ज्यादा मजबूती से पहुंचेंगे। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की चुनौती, आदिवासी इलाकों में विकास, शहरी राजनीति और प्रशासनिक मसलों पर दिल्ली में सुनवाई का स्तर बढ़ सकता है। इसके साथ ही लंबे समय से चर्चा में रही संगठनात्मक गुटबाजी को संतुलित करने की कोशिश भी तेज हो सकती है, क्योंकि नेतृत्व का राज्य से सीधा जुड़ाव है।
आने वाले समय में नगरीय निकाय, पंचायत और भविष्य के विधानसभा चुनावों की तैयारियों में नितिन नवीन की भूमिका अहम मानी जा रही है। पार्टी के भीतर यह संकेत भी मिल रहे हैं कि टिकट वितरण में अब नाम से ज्यादा काम और ग्राउंड रिपोर्ट को प्राथमिकता दी जा सकती है। युवा नेताओं को आगे बढ़ाने और अनुभवी चेहरों के साथ संतुलन साधने की रणनीति भी इसी सोच का हिस्सा हो सकती है।
केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय भी छत्तीसगढ़ के लिए एक बड़ा सियासी लाभ माना जा रहा है। केंद्र सरकार की योजनाओं को राज्य में किस तरह पेश किया जाए, किन इलाकों में ज्यादा फोकस हो, इस पर रणनीति और स्पष्ट हो सकती है। खासकर आदिवासी बहुल क्षेत्रों में विकास और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर पार्टी की लाइन और मजबूत होने की संभावना है।
जेपी नड्डा के कार्यकाल में जिस तरह छत्तीसगढ़ के संगठनात्मक अनुभव का इस्तेमाल राष्ट्रीय रणनीति में हुआ था, उसी तरह अब नितिन नवीन के दौर में भी ‘छत्तीसगढ़ मॉडल’ की झलक देखने को मिल सकती है। इससे कांग्रेस के लिए भी मुकाबला और सख्त हो सकता है, क्योंकि भाजपा राज्य में ज्यादा आक्रामक और संगठित रणनीति के साथ आगे बढ़ सकती है।
कुल मिलाकर, नितिन नवीन का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना सिर्फ एक संगठनात्मक बदलाव नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की राजनीति के लिए भी एक नए अध्याय की शुरुआत जैसा है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि पार्टी राज्य को किस तरह की प्राथमिकता देती है, लेकिन इतना तय है कि छत्तीसगढ़ अब भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहले से ज्यादा मजबूती से मौजूद रहेगा।