SIP Tips: एसआईपी शुरू या बंद करने से पहले समझ लें ये अहम सच, नहीं तो रिटर्न पर पड़ सकता है सीधा असर

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म्यूचुअल फंड में निवेश का सबसे लोकप्रिय तरीका बन चुका एसआईपी यानी सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान आज हर छोटे-बड़े निवेशक की पहली पसंद है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सिर्फ दिसंबर महीने में एसआईपी के जरिए रिकॉर्ड 31,002 करोड़ रुपये का निवेश हुआ। आसान शुरुआत और अनुशासन के कारण लोग इसे सुरक्षित मान लेते हैं, लेकिन यही सबसे बड़ी गलतफहमी भी बन जाती है। एसआईपी कोई जादुई फॉर्मूला नहीं, बल्कि एक निवेश तरीका है, जिसमें सही समझ और धैर्य बेहद जरूरी है।

सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि एसआईपी पूरी तरह जोखिम-मुक्त नहीं होता। अक्सर लोग मान लेते हैं कि एसआईपी में उतार-चढ़ाव का असर नहीं पड़ता, जबकि सच्चाई यह है कि म्यूचुअल फंड बाजार से जुड़े होते हैं। बाजार गिरेगा तो एसआईपी का मूल्य भी घटेगा और बाजार चढ़ेगा तो फायदा मिलेगा। फर्क सिर्फ इतना है कि एसआईपी जोखिम को समय में फैलाता है, खत्म नहीं करता। असली भूमिका सही फंड के चुनाव, निवेश की अवधि और आपकी जोखिम सहने की क्षमता की होती है।

एसआईपी की खूबी यह भी है कि इसे शुरू करने के लिए बड़ी रकम की जरूरत नहीं होती। महज 500 रुपये महीने से भी निवेश की शुरुआत की जा सकती है। जैसे-जैसे आमदनी बढ़ती है, एसआईपी की रकम बढ़ाई जा सकती है। जरूरत पड़ने पर इसे कुछ समय के लिए रोका भी जा सकता है, लेकिन विशेषज्ञ बार-बार यही सलाह देते हैं कि बिना मजबूरी एसआईपी बंद या रोकने से बचना चाहिए, क्योंकि इसका सीधा असर लंबे समय के रिटर्न पर पड़ता है।

एसआईपी में असली कमाल समय और कंपाउंडिंग दिखाती है। शुरुआत में रिटर्न मामूली लगता है, लेकिन जैसे-जैसे समय बढ़ता है, पैसा खुद पैसा कमाने लगता है। उदाहरण के तौर पर, अगर कोई निवेशक 20 साल तक हर महीने 1000 रुपये एसआईपी करता है और औसतन 12 प्रतिशत रिटर्न मिलता है, तो करीब 9.9 लाख रुपये का फंड बन सकता है। यही निवेश अगर 25 साल तक चलता रहे, तो रकम लगभग दोगुनी हो जाती है। यही कंपाउंडिंग की ताकत है, जो धैर्य रखने वालों को बड़ा फायदा देती है।

कई लोग बाजार गिरते ही घबरा जाते हैं और एसआईपी रोकने या बंद करने का फैसला कर लेते हैं, जबकि सच्चाई इसके उलट है। बाजार की गिरावट एसआईपी निवेशकों के लिए नुकसान नहीं, बल्कि मौका होती है। गिरावट के समय एक ही रकम में ज्यादा यूनिट्स मिलती हैं और जब बाजार ऊपर जाता है, तो वही यूनिट्स ज्यादा कीमत पर बिकती हैं। इसी सिद्धांत को रुपये की लागत औसत करना कहा जाता है, जो लंबे समय में रिटर्न को बेहतर बनाता है।

एसआईपी में सबसे बड़ा हथियार नियमितता है। अनुशासन टूटते ही पूरा गणित बिगड़ सकता है। मान लीजिए कोई व्यक्ति 20 साल तक हर महीने 20,000 रुपये की एसआईपी करता है, तो करीब 2 करोड़ रुपये का फंड बन सकता है। लेकिन अगर वह हर साल सिर्फ एक किस्त मिस कर देता है, तो कुल निवेश भले ही थोड़ा कम हो, मगर अंतिम कॉर्पस करीब 40 लाख रुपये तक घट सकता है। यानी छोटी-सी लापरवाही भी लंबे समय में बड़ा नुकसान करा सकती है।

रिटर्न को और मजबूत करने का सबसे असरदार तरीका है एसआईपी को हर साल बढ़ाना। अगर कोई निवेशक 5000 रुपये की एसआईपी 20 साल तक करता है, तो एक तय रिटर्न पर करीब 50 लाख रुपये जुटा सकता है। लेकिन अगर वही निवेशक हर साल एसआईपी की रकम 10 प्रतिशत बढ़ाता जाए, तो यही फंड लगभग 1 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। यही वजह है कि एसआईपी को शॉर्टकट नहीं, बल्कि धैर्य, अनुशासन और समझ का खेल कहा जाता है।

कुल मिलाकर, एसआईपी तभी असर दिखाता है जब निवेशक भावनाओं से नहीं, रणनीति से फैसले ले। जल्दबाजी में शुरू करना या घबराकर बंद करना दोनों ही रिटर्न को नुकसान पहुंचा सकते हैं। सही फंड, लंबा समय और नियमित निवेश—यही एसआईपी की असली कुंजी है।

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