Greenland Controversy: ग्रीनलैंड विवाद से रूस ने बनाई साफ दूरी, पुतिन बोले—‘यह हमारा मामला नहीं’

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ग्रीनलैंड को लेकर उठे अंतरराष्ट्रीय विवाद ने जहां पश्चिमी देशों की राजनीति में हलचल मचा दी है, वहीं रूस ने इस पूरे मसले से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है। अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump की ओर से ग्रीनलैंड को लेकर की गई टिप्पणी ने Denmark की राजनीति और North Atlantic Treaty Organization की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, लेकिन मॉस्को ने साफ कर दिया है कि उसे इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं है। रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin ने दो टूक कहा है कि ग्रीनलैंड से जुड़ा मुद्दा रूस के लिए न तो चिंता का विषय है और न ही उसकी विदेश नीति का हिस्सा।

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक के दौरान टेलीविजन के माध्यम से दिए गए बयान में पुतिन ने स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड को लेकर जो भी घटनाक्रम चल रहा है, वह पूरी तरह अमेरिका और डेनमार्क के बीच का मामला है। उन्होंने कहा कि रूस की इसमें कोई भूमिका नहीं है और न ही वह इस विषय में किसी तरह की दिलचस्पी रखता है। पुतिन के इस बयान को रूस की ओर से जानबूझकर बनाई गई दूरी के तौर पर देखा जा रहा है, ताकि वह पश्चिमी देशों के आपसी टकराव में न उलझे।

पुतिन ने अपने बयान में साफ कहा कि ग्रीनलैंड का भविष्य संबंधित पक्ष आपसी बातचीत से तय करेंगे। यह न तो रूस की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है और न ही उसकी विदेश नीति से। ऐसे में मॉस्को की ओर से इस पर किसी तरह की प्रतिक्रिया देने का सवाल ही नहीं उठता। उनका यह रुख इस बात का संकेत है कि रूस इस विवाद को पश्चिमी खेमे का आंतरिक मामला मानता है।

हालांकि पुतिन ने इस मौके पर डेनमार्क के रवैये पर एक तीखी टिप्पणी जरूर की। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक रूप से डेनमार्क ने ग्रीनलैंड को एक उपनिवेश की तरह देखा है। पुतिन के अनुसार, लंबे समय तक वहां के लोगों के प्रति डेनमार्क का व्यवहार सख्त और कई बार अमानवीय भी रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि मौजूदा समय में शायद इस पहलू पर ज्यादा चर्चा नहीं हो रही है, लेकिन इतिहास को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

रूसी राष्ट्रपति ने अपने बयान में इतिहास का हवाला देते हुए यह समझाने की कोशिश की कि क्षेत्रीय सौदे कोई नई बात नहीं हैं। उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 1917 में डेनमार्क ने वर्जिन आइलैंड्स अमेरिका को बेच दिए थे। इसी तरह 1867 में रूस ने अलास्का को अमेरिका को सौंप दिया था। पुतिन के इस संदर्भ को कई विश्लेषक इस रूप में देख रहे हैं कि वे यह बताना चाहते थे कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसे फैसले पहले भी लिए जाते रहे हैं।

डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयानों के बाद नाटो के भीतर भी बेचैनी साफ नजर आने लगी है। कई सदस्य देश इस मुद्दे पर असहज महसूस कर रहे हैं, क्योंकि यह गठबंधन की एकजुटता और आपसी भरोसे से जुड़ा हुआ है। हालांकि रूस ने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि वह न तो किसी एक पक्ष के समर्थन में खड़ा होगा और न ही इस विवाद को अपने हितों से जोड़कर देखेगा।

कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड विवाद ने जहां अमेरिका, डेनमार्क और नाटो के भीतर नई बहस छेड़ दी है, वहीं रूस ने रणनीतिक रूप से खुद को इससे अलग रखते हुए यह संदेश दे दिया है कि वह पश्चिमी देशों के इस टकराव में किसी भी तरह की भूमिका निभाने के मूड में नहीं है।

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