Gold–Silver ETFs Crash: रिकॉर्ड तेजी के बाद 21% तक टूटे भाव, क्या यही है खरीदारी का मौका?

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रिकॉर्ड ऊंचाई छूने के बाद सोना और चांदी आधारित ईटीएफ में अचानक आई तेज गिरावट ने निवेशकों को चौंका दिया है। 22 जनवरी को गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ में जोरदार बिकवाली देखने को मिली, जिससे बाजार में हलचल मच गई। Tata Silver ETF दिन के निचले स्तर पर करीब 21 फीसदी तक टूट गया, जबकि Birla Sun Life Gold ETF में लगभग 12 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई, हालांकि बाद के सत्र में थोड़ी रिकवरी जरूर दिखी। यह गिरावट सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना-चांदी की कीमतों में आई कमजोरी से जुड़ी मानी जा रही है।

दरअसल, इससे पहले भू-राजनीतिक तनाव, टैरिफ की आशंकाएं और वैश्विक अनिश्चितता के कारण सोना-चांदी ने रिकॉर्ड तेजी दिखाई थी। लेकिन जैसे ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेंटिमेंट बदला, सेफ-हेवन एसेट्स से पैसा निकलने लगा और इसका असर ईटीएफ कीमतों पर साफ नजर आया।

गिरावट की बड़ी वजह वैश्विक माहौल में अचानक आया बदलाव माना जा रहा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump के हालिया बयानों ने बाजार की दिशा बदल दी। ट्रंप ने संकेत दिए कि NATO के साथ ग्रीनलैंड को लेकर समझौते की रूपरेखा तैयार हो गई है और 1 फरवरी से प्रस्तावित टैरिफ अब लागू नहीं होंगे। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड को लेकर सैन्य विकल्प का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। इन संकेतों से वैश्विक तनाव कम हुआ और निवेशकों का झुकाव फिर से जोखिम वाले एसेट्स की ओर बढ़ा, जिससे सोना-चांदी जैसे सुरक्षित निवेश दबाव में आ गए।

मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह गिरावट किसी बड़े फंडामेंटल ब्रेकडाउन का संकेत नहीं है। VT मार्केट्स के सीनियर एनालिस्ट जस्टिन खू के मुताबिक, यह मूव मुख्य रूप से मुनाफावसूली और पोर्टफोलियो री-बैलेंसिंग का नतीजा है। जब किसी एसेट में बहुत तेज उछाल आता है, तो उसके बाद ऐसी करेक्शन स्वाभाविक मानी जाती है।

अब सवाल यह है कि निवेशकों को आगे क्या करना चाहिए। इस पर बाजार जानकारों की राय बंटी हुई नजर आती है। एक तरफ कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि लंबी अवधि के नजरिए से सोना और चांदी के फंडामेंटल अब भी मजबूत हैं। चांदी की मांग सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और AI इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टर्स से बनी हुई है, जबकि सोना अब भी महंगाई और भू-राजनीतिक जोखिमों के खिलाफ एक मजबूत हेज माना जाता है। दूसरी तरफ चेतावनी यह भी दी जा रही है कि इतनी तेज तेजी के बाद एकमुश्त निवेश करना जोखिम भरा हो सकता है।

कंजर्वेटिव निवेशकों के लिए सलाह दी जा रही है कि वे अपने कुल पोर्टफोलियो का लगभग 5 से 10 फीसदी हिस्सा गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ में रखें और वह भी SIP या चरणबद्ध तरीके से। इससे बाजार की टाइमिंग का जोखिम कम किया जा सकता है और वोलैटिलिटी का असर भी संतुलित रहता है।

आगे के रास्ते पर नजर डालें तो विशेषज्ञ मानते हैं कि शॉर्ट टर्म में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। बजट से जुड़ी उम्मीदें और वैश्विक सेंटिमेंट खासतौर पर चांदी में तेज हलचल ला सकते हैं। हालांकि लंबी अवधि में सेंट्रल बैंकों की खरीद, महंगाई का डर और वैश्विक अनिश्चितता सोना-चांदी को सपोर्ट देती रहेगी। ऐसे में मौजूदा गिरावट को घबराहट की बजाय समझदारी से देखने की जरूरत है—क्योंकि सही रणनीति के साथ यही करेक्शन भविष्य के लिए मौका भी बन सकता है।

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