तंजानिया की सोने की खान का सपना दिखाकर ढाई करोड़ की ठगी, रायपुर के कारोबारी से रची गई अंतरराष्ट्रीय जालसाजी

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रायपुर में सामने आया यह मामला दिखाता है कि भरोसे और लालच के बीच की महीन रेखा को पार करते ही ठगी कितनी दूर तक जा सकती है। तंजानिया में सोने की खान में हिस्सेदारी दिलाने का आकर्षक झांसा देकर एक शातिर जालसाज ने रायपुर के कारोबारी से करीब ढाई करोड़ रुपये हड़प लिए। आरोपी पीड़ितों का परिचित था और उसने विश्वास जमाने के लिए न सिर्फ विदेशी दौरे कराए, बल्कि कथित गोल्ड माइंस तक दिखाईं। बाद में पता चला कि पूरा ताना-बाना फर्जी दस्तावेजों, नकली कंपनियों और दिखावटी साझेदारों पर टिका था।

मोतीबाग, बंजारी बाबा दरगाह के पास रहने वाले समर्थ बरड़िया और उनके जीजा मुकुल चोपड़ा की शिकायत पर सिविल लाइंस पुलिस ने मुंबई निवासी यश शाह के खिलाफ धोखाधड़ी का अपराध दर्ज किया है। शिकायत के मुताबिक, करीब दो साल पहले मुंबई में पहली मुलाकात के दौरान यश ने मुकुल को तंजानिया में अपनी सोने की खान होने की कहानी सुनाई। उसने दावा किया कि 25 करोड़ रुपये के निवेश पर खान में हिस्सेदारी मिल सकती है और भरोसा दिलाने के लिए खनन टेंडर से जुड़े दस्तावेज भी दिखाए, जो बाद में फर्जी निकले।

कहानी यहीं नहीं रुकी। यश ने दोनों कारोबारियों को तंजानिया ले जाकर वहां कथित स्थानीय लोगों—एक अब्दुल्लाह और दो अन्य—से मुलाकात कराई। उसने यह समझाया कि तंजानिया में गोल्ड माइनिंग का ठेका पाने के लिए विदेशी निवेशकों को दो स्थानीय नागरिकों को पार्टनर बनाना अनिवार्य होता है। इस कथित नियम के नाम पर भरोसा और मजबूत किया गया। इसके बाद रायपुर आकर आरोपी ने फर्जी कागजात तैयार कर ‘एसकेएम बुलियन ट्रेडिंग’ के नाम से साझेदारी फर्म बनाई और तंजानिया के म्वान्जा बैंक में बैंक खाता खुलवाया।

यहीं से ठगी का असली खेल शुरू हुआ। पहले मुकुल से एक लाख अमेरिकी डॉलर ट्रांसफर कराए गए। फिर उसी खाते में समर्थ के माध्यम से बड़ी रकम भेजवाई गई। शिकायत के अनुसार, इस तरह झांसे में लेकर कुल ढाई करोड़ रुपये से अधिक की रकम विदेशी खाते में ट्रांसफर करा ली गई। जब निवेश और मुनाफे की बात आगे नहीं बढ़ी, तो संदेह गहराया और सच्चाई सामने आई—न तो कोई वास्तविक गोल्ड माइन थी, न वैध टेंडर, और न ही कथित साझेदारों की कोई ठोस पहचान।

अब पुलिस मामले की परतें खोल रही है। यह प्रकरण एक बार फिर चेतावनी देता है कि अंतरराष्ट्रीय निवेश के सुनहरे वादों के पीछे अक्सर कागजों का जाल, नकली कंपनियां और भरोसे की चोरी छिपी होती है।

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