पुलिसिया ज्यादती पर हाईकोर्ट की सख्त फटकार: होटल में घुसपैठ, बिना FIR गिरफ्तारी पर 1 लाख का हर्जाना

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कानून के रक्षक जब खुद कानून तोड़ने लगें, तो लोकतंत्र की नींव हिल जाती है—छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुर्ग जिले के एक ऐसे ही मामले में कड़ा संदेश दिया है। होटल में जबरन घुसकर ठहरे लोगों को कमरे से बाहर निकालना, महिला पुलिस के बिना तलाशी लेना, होटल मालिक से मारपीट करना और बिना किसी एफआईआर के जेल भेज देना—इन सबको अदालत ने असंवैधानिक करार दिया है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि पीड़ित होटल संचालक को चार सप्ताह के भीतर एक लाख रुपये का मुआवजा दे, और यह भी स्पष्ट किया कि जांच के बाद यह रकम दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से वसूली जा सकती है।

मामला दुर्ग के कोहका इलाके का है, जहां भिलाई के अवंतीबाई चौक निवासी आकाश कुमार साहू होटल संचालित करते हैं। वे लॉ के छात्र भी हैं और यही होटल उनके परिवार की आजीविका का एकमात्र साधन है। याचिका में बताया गया कि 8 सितंबर 2025 को पुलिस एक गुमशुदा लड़की की तलाश के नाम पर होटल पहुंची। शुरुआत बदतमीजी से हुई, फिर रजिस्टर और पहचान दस्तावेज देखने के बाद बिना महिला पुलिस के एक कमरे में जबरन प्रवेश किया गया, जहां महिला-पुरुष वैध दस्तावेजों के साथ ठहरे थे। उन्हें बाहर निकाला गया, मैनेजर के साथ दुर्व्यवहार हुआ और धमकियां दी गईं।

कुछ देर बाद पुलिस दोबारा लौटी और कर्मचारियों पर सोने के आभूषणों की चोरी का आरोप लगाया। जब होटल स्टाफ ने सीसीटीवी जांच की बात कही, तो जांच करने के बजाय कमरों की तलाशी शुरू कर दी गई। आरोप है कि इस दौरान मैनेजर की पिटाई की गई और मालिक को बुलाया गया। आकाश साहू के होटल पहुंचते ही कथित तौर पर पुलिस अफसर भड़क गए, गाली-गलौज की, अपमानित किया और विरोध करने पर जबरन थाने ले जाकर मारपीट की गई। इसके बाद बिना किसी वैध आधार के गिरफ्तारी दिखाकर जेल भेज दिया गया।

पुलिस ने अदालत में दलील दी कि वे गुमशुदा लड़की की तलाश में थे और आकाश ने सरकारी काम में बाधा डाली, वाहन की चाबी छीनी और ड्राइवर से हाथापाई की—इसी आधार पर बीएनएस की धारा 170 के तहत हिरासत ली गई। लेकिन सुनवाई के बाद अदालत ने पाया कि किसी भी संज्ञेय अपराध में कोई एफआईआर दर्ज नहीं थी। महज संदेह और कहासुनी के आधार पर जेल भेजना संविधान के अनुच्छेद 21 का सीधा उल्लंघन है। गिरफ्तारी के समय कारण लिखित में बताना अनिवार्य है—जबकि गिरफ्तारी मेमो पर खुद याचिकाकर्ता ने लिखा था कि उसे मामले की जानकारी नहीं है।

डिवीजन बेंच—रमेश सिन्हा और रविंद्र कुमार अग्रवाल—ने पुलिस के साथ-साथ एसडीएम की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को न्यायिक प्रहरी की भूमिका निभानी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने बिना विचार किए पुलिस रिपोर्ट पर मुहर लगा दी और युवक को न्यायिक हिरासत में भेज दिया। यह न्यायिक विवेक के दायित्व से चूक है।

अदालत ने याचिकाकर्ता के खिलाफ शुरू की गई समस्त आपराधिक कार्यवाही और पुलिस का इस्तगासा रद्द कर दिया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यदि भुगतान में देरी होती है, तो 9% वार्षिक ब्याज देना होगा। फैसले में एक अहम टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि पुलिस की अवैध कार्रवाइयां और गैर-कानूनी रिमांड आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास की नींव कमजोर करती हैं। ऐसे कृत्य संवैधानिक शासन में नागरिकों का भरोसा हिलाते हैं।

हाईकोर्ट ने गृह विभाग के सचिव को निर्देश दिया है कि पुलिस बल को मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोहराई न जाएं। यह फैसला सिर्फ एक व्यक्ति को न्याय नहीं देता, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग पर स्पष्ट चेतावनी भी है—कानून से ऊपर कोई नहीं।

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