बसंत पंचमी के साथ ही प्रकृति ने जैसे अपने सबसे उजले रंग खेतों में घोल दिए हों। बलौदा बाजार के सीसदेवरी गांव में दूर-दूर तक फैली सरसों की पीली आभा देखकर यही एहसास होता है कि धरती ने बसंती चुनरी ओढ़ ली है। हवा में हल्की-सी खुशबू, खेतों में लहराते फूल और किसानों के चेहरों पर संतोष की चमक—यह दृश्य केवल ऋतु परिवर्तन का नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आ रहे सकारात्मक बदलाव का भी संदेश दे रहा है।
सीसदेवरी गांव के खेतों में सरसों की यह बहार सिर्फ आंखों को सुकून नहीं देती, बल्कि किसानों के जीवन में स्थिरता और उम्मीद भी भर रही है। कुछ साल पहले तक यहां सरसों की खेती सीमित दायरे में होती थी, अधिकतर किसान बाड़ी में थोड़ी-बहुत सरसों उगाकर स्थानीय जरूरतें पूरी कर लेते थे। लेकिन जैसे-जैसे बाजार की मांग बढ़ी और खेती के अनुभव पुख्ता हुए, वैसे-वैसे किसानों ने बड़े पैमाने पर सरसों उत्पादन की ओर कदम बढ़ाया। आज वही सरसों उनकी आमदनी का भरोसेमंद आधार बन चुकी है।
समय के साथ यह बदलाव सिर्फ रकबे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सोच और तकनीक में भी दिखा। किसानों ने उत्पादन बढ़ाया, गुणवत्ता पर ध्यान दिया और स्थानीय स्तर पर ही सरसों से तेल निकालने की पहल शुरू की। गांव और आसपास के इलाकों में व्यापारी सीधे खेतों से सरसों खरीदने लगे, जिससे बिचौलियों पर निर्भरता घटी और किसानों को त्वरित भुगतान मिलने लगा। सरसों तेल की लगातार बनी मांग ने इस फसल को और भी लाभकारी बना दिया, नतीजतन गांव के दूसरे किसान भी इस राह पर आगे बढ़ने लगे।
सरसों की खेती की सबसे बड़ी ताकत इसकी सादगी है। कम पानी, कम लागत और अपेक्षाकृत कम जोखिम के बावजूद यह फसल अच्छी पैदावार देती है। पहले जहां किसान केवल वर्षा आधारित खरीफ फसलों पर निर्भर रहते थे, वहीं अब रबी सीजन में सरसों ने उन्हें एक सुरक्षित विकल्प दिया है। बदलते मौसम और जल संकट के दौर में यह फसल किसानों के लिए राहत बनकर उभरी है, जो आय को स्थिर रखने में मदद कर रही है।
आज सीसदेवरी गांव के खेतों में लहलहाती सरसों केवल बसंत के आगमन का संकेत नहीं, बल्कि ग्रामीण आत्मनिर्भरता की कहानी भी कहती है। पीले फूलों के बीच मेहनत, धैर्य और सही फैसलों का रंग घुला हुआ है। यह वही रंग है, जो किसानों के भविष्य को और उजला बना रहा है और यह बताता है कि जब प्रकृति और परिश्रम साथ चलते हैं, तो खेत सिर्फ फसल नहीं, उम्मीद भी उगाते हैं।