टीम इंडिया टेस्ट में क्यों पिछड़ रही है? राहुल द्रविड़ ने खोला राज, बताया असली संकट

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टी20 क्रिकेट में टीम इंडिया इस वक्त दुनिया की सबसे ताकतवर टीमों में गिनी जा रही है। आईसीसी रैंकिंग में नंबर-1 पर काबिज भारत घरेलू जमीन पर टी20 वर्ल्ड कप में खिताब बचाने उतरेगा और गौतम गंभीर के कोच बनने के बाद इस फॉर्मेट में टीम ने कोई सीरीज नहीं गंवाई है। लेकिन इसी चमक के बीच भारतीय टेस्ट टीम की तस्वीर लगातार धुंधली होती जा रही है, जिसने क्रिकेट विशेषज्ञों और फैन्स दोनों की चिंता बढ़ा दी है।

पिछले एक साल में भारत का घरेलू टेस्ट किला दो बार ढह चुका है। पहले न्यूजीलैंड और फिर साउथ अफ्रीका ने भारत को उसी की सरजमीं पर टेस्ट सीरीज में मात दी। गंभीर के कार्यकाल में अब तक भारत किसी भी टॉप रैंक टीम के खिलाफ टेस्ट सीरीज नहीं जीत पाया है। इकलौती जीत अक्टूबर 2025 में वेस्टइंडीज के खिलाफ घरेलू सीरीज में दर्ज हुई थी। सवाल साफ है—जो टीम टी20 में अजेय दिखती है, वही टेस्ट में क्यों जूझ रही है?

इसी सवाल का जवाब भारत के पूर्व कप्तान और पूर्व हेड कोच राहुल द्रविड़ ने खुलकर दिया है। बेंगलुरु में एक किताब के लॉन्च इवेंट के दौरान द्रविड़ ने टेस्ट क्रिकेट की सबसे बड़ी चुनौती की ओर इशारा किया। उनके मुताबिक, आज के दौर में ऑल-फॉर्मेट खिलाड़ियों के लिए रेड-बॉल क्रिकेट की तैयारी करना सबसे मुश्किल काम बन गया है।

द्रविड़ ने कहा कि एक कोच के तौर पर उन्होंने बार-बार यह महसूस किया कि जो खिलाड़ी तीनों फॉर्मेट खेलते हैं, वे लगातार एक फॉर्मेट से दूसरे में शिफ्ट करते रहते हैं। कई बार टीम टेस्ट मैच से सिर्फ तीन-चार दिन पहले पहुंचती थी और जब प्रैक्टिस शुरू होती थी, तो पता चलता था कि कुछ बल्लेबाजों ने चार-पांच महीने से रेड बॉल देखी ही नहीं है। ऐसे में अचानक सीम और टर्न लेती पिचों पर घंटों बल्लेबाजी करना आसान नहीं होता।

उन्होंने साफ कहा कि टेस्ट क्रिकेट स्किल के साथ-साथ समय भी मांगता है। यह फॉर्मेट धैर्य, तकनीक और मानसिक मजबूती की परीक्षा लेता है, लेकिन मौजूदा इंटरनेशनल कैलेंडर में खिलाड़ियों को इसके लिए पर्याप्त वक्त मिल ही नहीं पा रहा। द्रविड़ ने अपने खेलने के दौर को याद करते हुए बताया कि पहले टेस्ट और वनडे के बीच बदलाव के लिए खिलाड़ियों के पास तैयारी का समय होता था, लेकिन 2007 के बाद टी20 क्रिकेट के आगमन ने पूरा परिदृश्य बदल दिया।

आज की सच्चाई यह है कि जो खिलाड़ी तीनों फॉर्मेट खेल रहे हैं, वे रेड-बॉल क्रिकेट की तैयारी से ज्यादा व्हाइट-बॉल क्रिकेट में डूबे रहते हैं। आईपीएल जैसे टूर्नामेंट में ढाई महीने तक खिलाड़ी बड़े शॉट्स, स्ट्राइक रेट और आक्रामक बल्लेबाजी पर फोकस करते हैं। यही वजह है कि भारत की टी20 बल्लेबाजी लगातार विस्फोटक होती जा रही है, लेकिन टेस्ट में वही बल्लेबाज संयम और तकनीक के साथ संघर्ष करते दिखते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि मौजूदा टेस्ट कप्तान शुभमन गिल भी हाल ही में इसी समस्या की ओर इशारा कर चुके हैं। द्रविड़ ने माना कि गिल जैसे युवा खिलाड़ी, जो तीनों फॉर्मेट खेल रहे हैं, इस चुनौती को खुद महसूस कर रहे हैं। रेड-बॉल क्रिकेट की मांग और व्हाइट-बॉल क्रिकेट की आदतों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है।

फिलहाल भारत आईसीसी वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप 2025-27 की तालिका में छठे स्थान पर है। अगली टेस्ट सीरीज अगस्त में श्रीलंका में खेली जानी है, यानी टीम इंडिया के पास रेड-बॉल मोड में लौटने के लिए अभी वक्त है। बड़ा सवाल यही है कि क्या शेड्यूल, तैयारी और फॉर्मेट बैलेंस पर नए सिरे से सोचकर भारत एक बार फिर टेस्ट क्रिकेट में अपनी बादशाहत कायम कर पाएगा, या टी20 की चमक टेस्ट की चुनौतियों पर भारी पड़ती रहेगी।

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