विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए नियमों को लेकर चल रहा विवाद अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी द्वारा हाल ही में अधिसूचित नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जता दी है। इस फैसले के साथ ही यूजीसी के नए विनियमों की संवैधानिक वैधता और उनकी व्याख्या पर बड़े सवाल उठने तय माने जा रहे हैं।
बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमलय बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता पक्ष की दलीलों को गंभीरता से सुना। याचिका में कहा गया है कि यूजीसी के नए नियमों में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को बहुत संकीर्ण रखा गया है, जिससे कुछ वर्गों को संस्थागत संरक्षण से बाहर कर दिया गया है।
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के सामने यह तर्क रखा कि इन नियमों के तहत “सामान्य वर्ग” के खिलाफ संभावित भेदभाव की अनदेखी की गई है। उन्होंने कहा कि उनका मामला “राहुल दीवान और अन्य बनाम भारत संघ” से जुड़ा है, जिसमें समान अवसर और समान संरक्षण के अधिकार का सवाल उठाया गया है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत को इस मुद्दे की गंभीरता का अंदाजा है और इसमें मौजूद खामियों पर गौर किया जाएगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि मामले को विधिवत सूचीबद्ध कर सुनवाई की जाएगी।
दरअसल, विवाद की जड़ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अधिसूचित UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026 हैं। इन नए नियमों के तहत हर उच्च शिक्षण संस्थान में गठित समितियों में OBC, SC, ST, दिव्यांग और महिला प्रतिनिधियों की भागीदारी अनिवार्य की गई है। ये नियम 2012 के पुराने विनियमों की जगह ले रहे हैं, जो मुख्य रूप से सलाहकारी प्रकृति के थे।
याचिका में आपत्ति इस बात पर जताई गई है कि “जाति-आधारित भेदभाव” को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दिया गया है। इससे सामान्य या गैर-आरक्षित वर्ग से जुड़े उन लोगों को संस्थागत शिकायत निवारण और संरक्षण से बाहर कर दिया गया है, जिन्हें अपनी जातिगत पहचान के कारण उत्पीड़न या पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ सकता है।
इन्हीं आशंकाओं को लेकर देश के कई हिस्सों में छात्र संगठनों और विभिन्न समूहों ने विरोध प्रदर्शन भी शुरू कर दिए हैं। उनका कहना है कि ये नियम समानता की बात तो करते हैं, लेकिन व्यवहार में सभी वर्गों को समान संरक्षण नहीं देते। अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से यह तय होगा कि यूजीसी के ये नियम संविधान के समानता के सिद्धांत पर खरे उतरते हैं या नहीं।
इस मामले पर आने वाला फैसला न सिर्फ उच्च शिक्षा संस्थानों की कार्यप्रणाली को प्रभावित करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि भेदभाव की परिभाषा और उससे जुड़ा संरक्षण भारत की शिक्षा व्यवस्था में किस दिशा में आगे बढ़ेगा।