UGC Equity Regulations 2026 पर MK Stalin का बयान: देरी हुई, लेकिन समानता नियम स्वागत योग्य—और मजबूत करने की जरूरत

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तमिलनाडु के मुख्यमंत्री M. K. Stalin ने उच्च शिक्षा में समानता को बढ़ावा देने के लिए लाए गए University Grants Commission (UGC) के नए नियमों पर संतुलित लेकिन तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026 भले ही देर से आए हों, लेकिन यह भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक सकारात्मक और स्वागत योग्य कदम है—खासकर उस व्यवस्था में, जो लंबे समय से गहरे जमे भेदभाव और संस्थागत उदासीनता से जूझ रही है।

मुख्यमंत्री ने जोर दिया कि इन नियमों को केवल अधिसूचित करना पर्याप्त नहीं है। इन्हें और मजबूत किया जाना चाहिए, संरचनात्मक कमियों को दूर करने के लिए संशोधित किया जाना चाहिए और वास्तविक जवाबदेही के साथ लागू किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि समानता के उपाय कोई वैकल्पिक नीति नहीं, बल्कि मौजूदा हालात में एक अनिवार्य आवश्यकता हैं।

गौरतलब है कि 13 जनवरी को UGC ने 2012 के पुराने भेदभाव-विरोधी ढांचे की जगह UGC Equity Regulations 2026 को अधिसूचित किया। नए नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव सहित हर तरह के भेदभाव से प्रभावी ढंग से निपटना है, ताकि शासन व्यवस्था अधिक जवाबदेह बन सके।

इस कदम पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री ने दावा किया कि केंद्र में भाजपा के सत्ता में आने के बाद उच्च शिक्षा संस्थानों में, विशेषकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों के बीच, आत्महत्याओं की घटनाओं में बढ़ोतरी देखने को मिली है। उन्होंने यह भी कहा कि दक्षिण भारत, कश्मीर और अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों के खिलाफ उत्पीड़न की घटनाएं सामने आती रही हैं—ऐसे संदर्भ में समानता के नियमों का महत्व और बढ़ जाता है।

मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि जातिगत भेदभाव के उन्मूलन और ओबीसी को इस ढांचे में शामिल करने के घोषित लक्ष्य समर्थन के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि जैसे मंडल आयोग की सिफारिशों के समय विरोध देखा गया था, वैसी ही प्रतिगामी मानसिकता आज भी समानता के प्रयासों के खिलाफ दबाव बनाती दिखती है—और केंद्र सरकार को ऐसे दबावों के आगे झुकना नहीं चाहिए।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर अपने पोस्ट में मुख्यमंत्री ने चेताया कि संस्थागत प्रमुखों की अध्यक्षता वाली समानता समितियों की स्वतंत्रता पर भी गंभीर सवाल हैं, खासकर तब जब अतीत में रोहित वेमुला जैसे मामलों में कुलपतियों पर ही आरोप लगे हों। उनके मुताबिक, यदि केंद्र सरकार वास्तव में छात्र मौतों को रोकने, भेदभाव खत्म करने और पिछड़े समुदायों के छात्रों में ड्रॉपआउट दर घटाने को लेकर गंभीर है, तो इन नियमों को कागजों से आगे ले जाकर ज़मीनी स्तर पर प्रभावी बनाना होगा।

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