बिना पंजीयन चल रहा था रियल इस्पात प्लांट: नियमों की अनदेखी ने ली 6 मजदूरों की जान, जांच में खुली लापरवाही की परतें

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बलौदा बाजार जिले के भाटापारा तहसील अंतर्गत ग्राम बकुलाही में स्थित मेसर्स रियल इस्पात एंड एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड में 22 जनवरी को हुआ भीषण औद्योगिक हादसा अब प्रशासनिक और कानूनी दृष्टि से गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। इस दुर्घटना ने न सिर्फ उद्योग प्रबंधन की घोर लापरवाही को उजागर किया, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि कैसे कानूनों की खुली अवहेलना मजदूरों की जान पर भारी पड़ सकती है। कलेक्टर दीपक सोनी के निर्देश पर गठित संयुक्त जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर कारखाना प्रबंधन को नोटिस जारी कर एक सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया गया है।

जांच में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि यह उद्योग पिछले दो वर्षों से जिला उद्योग एवं व्यापार केंद्र से आवश्यक पंजीयन और वाणिज्यिक उत्पादन की अनुमति लिए बिना संचालित किया जा रहा था। स्पष्ट शासन निर्देशों के बावजूद प्लांट में बड़े पैमाने पर उत्पादन चलता रहा और श्रमिकों से अत्यंत जोखिम भरे हालात में काम कराया गया। यह न केवल औद्योगिक नीति का उल्लंघन है, बल्कि सीधे तौर पर मजदूरों के जीवन के साथ खिलवाड़ भी है।

रिपोर्ट के अनुसार किल्न क्रमांक-01 को शटडाउन किए बिना संचालन जारी रखा गया और डस्ट सेटलिंग चेंबर में जमी गर्म ऐश को हटाने के लिए श्रमिकों को उतार दिया गया। न तो किसी तरह की विधिवत कार्य अनुमति जारी की गई और न ही सुरक्षा मानकों का पालन किया गया। हैरानी की बात यह है कि नवनियुक्त और अप्रशिक्षित श्रमिकों को बिना किसी सेफ्टी ट्रेनिंग के सीधे जानलेवा कार्यस्थल में भेज दिया गया।

श्रम कानूनों के मोर्चे पर भी हालात उतने ही गंभीर पाए गए। न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत वेतन और सुविधाओं का कोई विधिवत रिकॉर्ड नहीं मिला। संविदा श्रमिक अधिनियम 1970 के अंतर्गत आवश्यक अनुज्ञप्ति लिए बिना 100 से अधिक मजदूरों से काम कराया जा रहा था। वहीं अंतर्राज्यीय प्रवासी श्रमिक अधिनियम 1979 की अनदेखी करते हुए बिना अनुमति अन्य राज्यों के श्रमिकों को नियोजित किया गया। जांच साफ संकेत देती है कि प्रबंधन ने श्रमिकों की सुरक्षा, अधिकार और गरिमा—तीनों को नजरअंदाज किया।

22 जनवरी 2026 को सुबह करीब 9:40 बजे किल्न क्रमांक-01 के डस्ट सेटलिंग चेंबर में अचानक विस्फोट और गर्म ऐश की बौछार हुई, जिसमें 6 मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि 5 अन्य गंभीर रूप से झुलस गए। हादसे के बाद कारखाना अधिनियम 1948 की धारा 40(2) के तहत किल्न क्रमांक-01 के संचालन और मेंटेनेंस कार्यों पर तत्काल रोक लगा दी गई।

हालांकि प्रबंधन ने मृत श्रमिकों के परिजनों को ₹20-20 लाख और घायलों को ₹5-5 लाख का मुआवजा दिया है, लेकिन जांच रिपोर्ट साफ करती है कि मुआवजा देकर जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता। दो वर्षों से अवैध संचालन, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और श्रम कानूनों का उल्लंघन—इन सबने मिलकर इस त्रासदी को जन्म दिया। अब निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं कि क्या दोषियों पर सख्त कानूनी शिकंजा कसा जाएगा या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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