चुनाव से ठीक पहले पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर सियासी और संवैधानिक बहस तेज हो गई है। बुधवार को खुद ममता बनर्जी Supreme Court of India पहुंचीं और इस प्रक्रिया के खिलाफ याचिका पर अपनी बात मजबूती से रखी। उनका आरोप था कि SIR को “जल्दबाजी, अपारदर्शिता और असंवैधानिक तरीकों” से अंजाम दिया जा रहा है, जिससे बड़ी संख्या में मतदाताओं को वोट के अधिकार से वंचित किए जाने का खतरा है।
अदालत को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि वह इस राज्य से आती हैं और न्यायपालिका के प्रति आभार रखती हैं, लेकिन जब “न्याय बंद दरवाजों के पीछे रोता है” तो आम नागरिकों को यह महसूस होने लगता है कि कहीं भी न्याय नहीं मिल रहा। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर Election Commission of India को छह पत्र लिखे जा चुके हैं। खुद को “बंधुआ मजदूर” की तरह बताते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि यह लड़ाई किसी पार्टी की नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों की है।
मुख्यमंत्री ने SIR की मौजूदा प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। उनके मुताबिक, इसका उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना कम और नाम हटाना ज्यादा प्रतीत हो रहा है। उन्होंने कहा कि शादी के बाद उपनाम बदलने वाली महिलाएं, प्रवासी मजदूर और गरीब परिवार मामूली तकनीकी या “तार्किक” त्रुटियों के आधार पर सूची से बाहर किए जा रहे हैं—जो लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा आघात है।
आधार को लेकर अदालत की टिप्पणी का जिक्र करते हुए ममता ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि आधार कार्ड को वैध दस्तावेजों में शामिल किया जा सकता है, तो इससे आम लोगों को बड़ी राहत मिली। उन्होंने तर्क दिया कि जब दूसरे राज्यों में डोमिसाइल और जाति प्रमाण पत्र स्वीकार किए जाते हैं, तो पश्चिम बंगाल के साथ अलग व्यवहार क्यों?
इसी कड़ी में उन्होंने सबसे तीखा सवाल दागा—“असम में SIR क्यों नहीं?” उनका कहना था कि जब चार राज्यों में चुनाव होने हैं, तो 24 साल बाद अचानक सिर्फ तीन महीनों में यह प्रक्रिया क्यों पूरी की जा रही है। फसल कटाई के मौसम और बड़े पैमाने पर लोगों के आवागमन के बीच चलाए गए इस अभियान से 100 से ज्यादा लोगों की मौत, कई BLO की जान जाने और अनेक के अस्पताल में भर्ती होने का दावा भी उन्होंने अदालत के सामने रखा।
ममता बनर्जी ने यह आरोप भी लगाया कि इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स की भूमिका सीमित कर दी गई है और उनकी जगह 8,300 माइक्रो ऑब्जर्वर्स लगाए गए हैं—जिनमें से कई बीजेपी-शासित राज्यों से बताए गए। उनके अनुसार, बिना समुचित सत्यापन के नाम काटे जा रहे हैं, फॉर्म-6 स्वीकार नहीं किए जा रहे और यहां तक कि जीवित लोगों को मृत घोषित कर दिया गया—जो महिलाओं के खिलाफ भी है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने व्यावहारिक समाधान पर जोर दिया और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह सोमवार तक ग्रुप-बी अधिकारियों की सूची अदालत में सौंपे, जिन्हें इस प्रक्रिया में लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर, मामला अब सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं, बल्कि देशभर में चुनावी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता और नागरिक अधिकारों पर एक बड़ी संवैधानिक बहस का रूप ले चुका है।