₹40 हजार करोड़ के कथित बैंक फ्रॉड से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि अब जांच में किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अनिल अंबानी से जुड़े इस मामले में कोर्ट ने यह भी रिकॉर्ड पर लिया कि वे अदालत की पूर्व अनुमति के बिना देश नहीं छोड़ेंगे। सुनवाई के दौरान जांच एजेंसियों पर नाराजगी जाहिर करते हुए कोर्ट ने कहा कि CBI और ED अब तक जांच में हुई देरी का कोई ठोस कारण नहीं बता सकीं, जबकि उन्हें पहले ही पर्याप्त समय दिया जा चुका है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने एजेंसियों को चार हफ्ते के भीतर ताजा स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इतने गंभीर और बड़े आर्थिक अपराध के आरोपों में अब और समय गंवाने की कोई गुंजाइश नहीं है।
यह मामला तब और गंभीर हो गया, जब याचिकाकर्ता और पूर्व IAS अधिकारी ईएएस सरमा ने अदालत में आशंका जताई कि अनिल अंबानी देश छोड़ सकते हैं। इस पर अनिल अंबानी की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि उनके मुवक्किल अदालत की अनुमति के बिना विदेश नहीं जाएंगे। इसी आश्वासन को कोर्ट ने अपने आदेश का हिस्सा बनाया।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि अनिल अंबानी के खिलाफ पहले ही लुकआउट सर्कुलर जारी किया जा चुका है। ED के मुताबिक अनिल अंबानी समूह की कंपनियों के जरिए करीब ₹40 हजार करोड़ की रकम सायफन किए जाने का आरोप है, जिसमें से अपराध की कमाई लगभग ₹20 हजार करोड़ आंकी गई है। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि यह बेहद बड़ी राशि है और ऐसे मामलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। ED अब तक ₹8,078 करोड़ की संपत्ति अस्थायी रूप से अटैच कर चुकी है।
वहीं, अनिल अंबानी की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने आरोपों से इनकार करते हुए दलील दी कि रिलायंस पावर और रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी कंपनियां लगभग ₹20 हजार करोड़ चुका चुकी हैं। उनका कहना था कि कारोबारी घाटे और कर्ज चूक को आपराधिक मामले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हालांकि कोर्ट ने इस दलील पर फिलहाल कोई नरमी नहीं दिखाई।
मामले की जड़ 2007-08 तक जाती है, जहां याचिका के मुताबिक फ्रॉड उसी दौर से शुरू हो गया था, लेकिन FIR 2025 में दर्ज की गई। आरोप है कि 2013 से 2017 के बीच RCOM, Reliance Infratel और Reliance Telecom ने SBI सहित अन्य बैंकों से ₹40 हजार करोड़ से ज्यादा का कर्ज लिया, जिसका इस्तेमाल तय उद्देश्य के बजाय दूसरी जगह किया गया। समय पर भुगतान न होने से ये खाते NPA बन गए।
ED की जांच में यह भी सामने आया है कि Reliance Home Finance और Reliance Commercial Finance में बड़े पैमाने पर फंड्स का गलत इस्तेमाल हुआ। 2017 से 2019 के बीच Yes Bank ने इन कंपनियों में हजारों करोड़ का निवेश किया, जो बाद में NPA में बदल गया। ED का दावा है कि यह रकम समूह की अन्य कंपनियों में डायवर्ट की गई और लोन अप्रूवल प्रोसेस में जानबूझकर कंट्रोल फेल्योर किया गया।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह रुख साफ संकेत देता है कि देश के सबसे बड़े कॉरपोरेट मामलों में अब जांच एजेंसियों से जवाबदेही तय की जाएगी। अदालत ने साफ कर दिया है—मामला चाहे जितना बड़ा नाम क्यों न जुड़ा हो, अब देरी और ढिलाई की कोई जगह नहीं है।